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कुरुक्षेत्र के कलाकारों ने नाटक कालचक्र में दिखाया बुजुर्गों का दर्द

कुरुक्षेत्र के कलाकारों ने नाटक कालचक्र में दिखाया बुजुर्गों का दर्द

तड़पते मां-बाप की तड़प से रुबरु करवा गया नाटक कालचक्र।

कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 31 अगस्त : हरियाणा कला परिषद द्वारा शनिवार को कला कीर्ति भवन मे आयोजित सांस्कृतिक संध्या में नाटक कालचक्र का मंचन किया गया। कला सृष्टि मंच कुरुक्षेत्र के कलाकारों द्वारा वरिष्ठ रंगकर्मी बृज शर्मा के लेखन व निर्देशन में मंचित नाटक कालचक्र में बुजुर्ग माता-पिता की तड़प तथा अकेलेपन को दिखाने का प्रयास किया गया। इस मौके पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा. विरेंद्र पाल बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे। वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजसेवी व प्रेरणा संस्थान के संरक्षक डॉ. जयभगवान सिंगला ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पैनोरमा के निदेशक डा. सुरेश सोनी उपस्थित रहे। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर की गई। नाटक कालचक्र एक बुजुर्ग दम्पति धनपत और लीला के अकेलेपन की कहानी को दर्शाता है। नाटक में दिखाया गया कि धनपत और लीला अपने छोटे बेटे श्याम और बहू रेवती के साथ रहते हैं। लेकिन आए दिन उन्हें अपने बेटे-बहू के ताने सुनने को मिलते हैं। अपने मां-बाप से परेशान श्याम अपने बड़े भाई नवीन को फोन करके मां-बाबू जी को अपने पास रखने को कहता है। लेकिन नवीन अपनी समाजसेविका पत्नी शशी के डर के कारण अपने माता-पिता को रखने से मना कर देता है। दोनों बच्चों की अनदेखी और बेरुखी से परेशान होकर धनपत एक दिन अखबार में विज्ञापन देता है, जिसमें वह अपनी पत्नी सहित स्वयं को गोद लेने की सिफारिश करता है। एक दिन एक पढ़े-लिखे दम्पति डा. बजाज और आशा विज्ञापन पढ़कर धनपत के घर आ जाते हैं। और दोनों बुजुर्गों को माता-पिता के रुप में गोद लेने की बात करते हैं। धनपत के दोनो बेटे और बहुंए समाज में अपनी बेइज्जती का हवाला देते हुए इंकार कर देती है। लेकिन धनपत उनकी एक नहीं सुनता और अपनी पत्नी सहित बजाज और आशा के घर चले जाते हैं। वहां दोनों बुजुर्गों को खूब मान-सम्मान मिलता है। लेकिन धीरे-धीरे बच्चों से बिछड़ने का गम भी बुजुर्ग दम्पति को खोखला करता रहता है। एक दिन लीला की मौत हो जाती है और उसका सदमा धनपत भी नहीं सह पाता और अपने बच्चों को याद करते हुए दम तोड़ देता है। इस प्रकार नाटक बुजुर्ग के तिरस्कार और अनदेखी के खिलाफ लोगों को जागरुक करने का संदेश देता है। नाटक में धनपत का किरदार स्वयं बृज शर्मा ने निभाया। वहीं लीला की भूमिका रेणू खुग्गर ने अदा की। अन्य भूमिकाओं में जय भगवान सिंगला, दीपक कौशिक, नीरज आश्री, अन्नपूर्णा शर्मा, आशी क्षेत्रपाल, दीपक शर्मा, सत्यभूषण, साक्षी गौतम, सुरेखा, आशा सिंगला, शालिनी शर्मा, सुदेश मदान, नमिता, संजीव छाबड़ा, शशी अहलावादी, जयश्री, मानिनी सेतिया, भावना, सहदेव, स्वरित, सुशील, अमरजीत आदि ने सहयोग दिया। अंत में नाटक निर्देशक बृज शर्मा तथा मुख्य अतिथि डा. विरेंद्र पाल को हरियाणा कला परिषद की ओर कार्यालय प्रभारी धर्मपाल गुगलानी ने स्मृति चिन्ह भेंटकर आभार जताया। इस मौके पर वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक, डा. संजीव कुमारी, सानवी, डा. चितरंजन दास सिंह कौशल, योगेश्वर जोशी, डा. मोहित गुप्ता, वीरेन, रमाकांता, हरबंस कौर, ममता सूद, शिवकुमार किरमच आदि उपस्थित रहे।

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