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सरस्वती नदी के तट पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता हुई विकसित: भारत भूषण भारती

वेद एवं वैज्ञानिक रूप से प्रमाणिक है पवित्र सरस्वती नदी : भारत भूषण भारती।
सरस्वती नदी बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परम्परा की जननी : प्रो. सोमनाथ सचदेवा
कुवि कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने केयू स्थित सरस्वती केन्द्र का नाम दर्शन लाल जैन सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर रिसर्च ऑन सरस्वती रिवर करने की उद्घोषणा
केयू सीनेट हॉल में हरियाणा सरस्वती हैरिटेज डेवलेपमेंट बोर्ड, पंचकुला व कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दर्शन लाल जैन सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर रिसर्च ऑन सरस्वती रिवर के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का हुआ शुभारम्भ

कुरुक्षेत्र, (प्रमोद कौशिक) 20 जनवरी : हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री के विशेष कत्र्तव्य अधिकारी भारत भूषण भारती ने कहा कि सरस्वती नदी के तट पर ही भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता विकसित हुई है। उन्होंने कहा कि पवित्र सरस्वती नदी का वर्णन हमें वेदों, ग्रंथों में पवित्र नदी एवं वाणी की देवी सरस्वती के रूप में भी मिलता है। उन्होंने कहा कि सरस्वती नदी वेद और वैज्ञानिक दोनों रूपों में प्रमाणिक है। यह उद्गार उन्होंने मंगलवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हरियाणा सरस्वती हैरिटेज डेवलेपमेंट बोर्ड, पंचकुला व कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय सरस्वती शोध उत्कृष्टता केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में ‘सरस्वती नदी – भारतीय ज्ञान प्रणाली और संस्कृति की जननी’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्यातिथि व्यक्त किए। इससे पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ मां सरस्वती के समक्ष सभी अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इस मौके पर कुवि कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने मुख्यमंत्री के ओएसडी भारत भूषण भारती को पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिह्न देकर स्वागत किया। भारत भूषण भारती ने कहा कि सरस्वती को खोजने के अभियान का भगीरथ प्रयास माननीय दर्शन लाल जैन के सानिध्य में ही शुरू हुआ। जिनके दृढ़ संकल्प को तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल एवं वर्तमान मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने साकार करने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के माना गांव में दर्शन लाल जैन की अगुवाई में सरस्वती नदी के पुन: उद्धार का कार्य 1984 में शुरू हुआ था। उन्होंने कहा कि आज हरियाणा के आदिबद्री से शुरू होकर सरस्वती नदी सिरसा हैड तक 400 किलोमीटर क्षेत्र में अविरल प्रवाहित हो रही है। हरियाणा सरकार का भी यह प्रयास है कि पूरे 12 महीने पवित्र सरस्वती नदी में जल की धारा बहती रहे। सरस्वती को आस्था के केन्द्र में विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों को चिन्हित कर घाट भी बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में आई भारी बारिस के पानी को भी सरस्वती नदी ने अपने में समाहित किया तथा फसलों को खराब होने से बची। इसके साथ ही उन्होंने सरस्वती नदी को प्रदूषित होने से बचाने की मुहिम की बात भी की। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा सनातन एवं संस्कृति विषय की स्मारिका का भी विमोचन किया गया।
कांफ्रेंस की अध्यक्षता करते हुए कुवि कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि सरस्वती नदी बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परम्परा की जननी है। उन्होंने केयू स्थित सरस्वती केन्द्र का नाम दर्शन लाल जैन सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर रिसर्च ऑन सरस्वती रिवर करने की उद्घोषणा करते हुए कहा कि यह माननीय दर्शन लाल जैन द्वारा सरस्वती के जीर्णोद्धार को लेकर किए गए कार्यों के प्रति कृतज्ञता है।
उन्होंने कहा कि केयू ने एनईपी 2020 को पूरे भारत में सर्वप्रथम सभी प्रावधानों के साथ लागू किया है। इसके साथ ही एनईपी के अनुरूप इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए सरस्वती नदी के महत्व को शैक्षिक स्तर पर ले जाने के लिए ’वैल्यू एडेड कोर्स’ भी शुरू किए गए है, ताकि युवा पीढ़ी इसके वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व को भी समझ सके। इसके साथ ही उन्होंने जापान देश में स्वच्छता के लिए मानवीय एवं चारित्रिक मूल्यों की सराहना करते हुए इसे अपनाने की बात भी कही।
सरस्वती हैरिटेज डेवलमेंट बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच ने वीडियों के माध्यम से दिखाया कि किस प्रकार सरस्वती नदी का आदिबद्री से उद्गम होते हुए पूरे हरियाणा में 400 किलोमीटर तक इसके जल प्रवाह को विकसित किया गया। उन्होंने छिल्लौर रामपुर, इस्सरगढ़, संघौर, बादली, कोल्हापुर, बीबीपुर झील सहित कई गांवों मे बनाए जल संरक्षण के स्रोतों को भी दिखाया जिसमें सरस्वती नदी भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने के साथ-साथ बाढ़ की स्थिति को भी नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने कहा कि सरस्वती नदी के तटों के मुख्य स्थानों पर पिंड दान स्थल भी बनाए गए है जो हमारी आध्यात्मिकता के केन्द्र बिन्दू है। दीनबंधु छोटूराम साइंस एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, मुरथल के कुलगुरु प्रो. एसपी सिंह ने नदियों के संरक्षण की बात करते हुए प्रकृति एवं समाज के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मुख्य वक्ता पूर्व कुलगुरु रमेश चंद भारद्वाज ने कहा कि भारतीय समाज ने विश्व कल्याण के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा जैसी चिंतन परम्पराएं दी हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में साहित्यिक संदभ, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक तथा लोक परम्पराएं शामिल हैं।
केयू डॉ. बीआर अम्बेडकर अध्ययन केन्द्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि सरस्वती नदी आज भी प्रवाहमान है। उन्होंने कहा पहले इतिहास में हमें मैसोपोटामिया, पनामा की संस्कृति पढ़ाई जा रही थी लेकिन माननीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारतीय संस्कृति संबंधी पाठ्यक्रम निर्माण का अहम कार्य शुरू हुआ।
बोर्ड के सीईओ कुमार सुप्रविन ने सरस्वती हैरिटेज बोर्ड की गतिविधियों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि अब तक सरस्वती नदी के किनारे 111 तीर्थों का जीर्णोद्धार हुआ है। वहीं घाटों की चार दिवारी के साथ जल संरक्षण का कार्य भी हुआ है। कांफ्रेंस में प्रो. एके गुप्ता, लक्ष्य जैन एवं डॉ. दीपक जैन ने सरस्वती नदी की खोज के संबंध में वैज्ञानिक तथ्यों को रखते हुए इसकी ऐतिहासिकता के बारे में बताया। केन्द्र के निदेशक प्रो. एआर चौधरी ने कहा कि सरस्वती नदी का इतिहास 2.5 करोड़ वर्षों पुराना है। जिसकी वैज्ञानिकता को भी प्रमाणित किया गया है। आयोजन सचिव डॉ. अरविन्द कौशिक द्वारा सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया गया। इस अवसर पर कांफ्रेंस में प्रो. प्रीति जैन, प्रो. डीएस राणा, प्रो. शुचिस्मिता, प्रो. परमेश कुमार, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, उपनिदेशिका डॉ. जिम्मी शर्मा, कुटा प्रधान डॉ. जितेन्द्र खटकड़, डॉ. मीनाक्षी सुहाग, डॉ. हरविन्द्र सिंह लोंगोवाल सहित शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।
सरस्वती सभ्यता पर विशेष प्रदर्शनी
दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता को लेकर विशेष प्रदर्शनी केयू ऑडिटोरियम के क्रश हॉल में लगाई गई। इस अवसर पर प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए मुख्यमंत्री के ओएसडी भारत भूषण भारती ने कहा कि यह प्रदर्शनी सरस्वती सिन्धु सभ्यता, वैदिक काल में सरस्वती नदी के किनारे स्थित तीर्थ स्थलों सहित सरस्वती नदी के उद्गम स्थलों को समर्पित है। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी सरस्वती नदी की ऐतिहासिकता, वैज्ञानिकता एवं आध्यात्मिक चितंन के साथ भारतीय संस्कृति एवं चिंतन को भी प्रदर्शित करती है।

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