सरस्वती नदी सप्त सिंधु नदियों में प्रमुख : डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री

सरस्वती नदी की वैज्ञानिक प्रमाणिकता स्थापित : प्रो. वीरेन्द्र पाल।
केयू सीनेट हॉल में ‘सरस्वती नदी – भारतीय ज्ञान प्रणाली और संस्कृति की जननी’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस का सफल समापन।
कुरुक्षेत्र, (प्रमोद कौशिक) 21 जनवरी : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हरियाणा सरस्वती हेरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दर्शन लाल जैन सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर रिसर्च ऑन सरस्वती रिवर केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में ‘सरस्वती नदी – भारतीय ज्ञान प्रणाली और संस्कृति की जननी’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के समापन अवसर पर डॉ.कुलदीप अग्निहोत्री, वाइंस चैयरमेन हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति एकेडमी, पंचकुला ने बतौर मुख्यातिथि कहा कि सरस्वती नदी सप्त सिंधु नदियों में प्रमुख थी। इसके वेद, पुराणों, लोक साहित्य एवं वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं। उन्होंने कहा कि नॉथ वेस्ट इंडिया प्रायोगिक रूप से सप्त सिंधु ही है। अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास में सरस्वती नदी को मिथ माना था जिसके चलते लोगों ने सरस्वती नदी को लुप्त मानना स्वीकार किया। इस अवसर पर कार्यक्रम का शुभारम्भ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। केन्द्र के निदेशक प्रो. एआर चौधरी ने सभी अतिथियों का स्वागत एवं परिचय दिया।
डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री ने कहा कि किसी भी देश का भूगोल उसके इतिहास को भी सुनिश्चित करता है। भारत की पूरी संस्कृति जम्बूद्वीप में स्थित थी जिसमें एक देश हिन्दुस्तान था इसके इतिहास एवं संस्कृति को अंग्रेजों ने समाप्त करने का काम किया। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार प्रकृति ने भारत की सीमाओं को बनाया है जिसमें पहाड़ से लेकर समुद्र भी है। यह सप्त सिंधु क्षेत्र है जहां सात नदियों का वर्णन वेद, पुराणों में भी मिलता है। इसलिए सरस्वती नदी को लेकर हमें अपनी सोच विकसित करनी होगी तभी धरातल पर सरस्वती नदी को लाने के भगीरथ प्रयास में हम सभी सफल होंगे।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि सरस्वती नदी की वैज्ञानिक प्रमाणिकता स्थापित हो चुकी है लेकिन अभी भी मानसिकता में परिवर्तन लाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति पहले से विकसित रही है लेकिन इसे हम आक्रांताओं के कारण भूल चुके है। इसके इकट्ठा करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हाल ही में अजंता एलोरा गुफाओं पर चिन्हित पैर्टन पर, नारियल की रस्सियों से बुना गया कोडिन्य जहाज ने गुजरात से ओमान की सफल यात्रा की। हमारे पूर्वजों का ज्ञान मिथ्या नहीं था बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा पर आधारित था जिसमें विश्व कल्याण की भावना निहित थी। उन्होंने कहा कि भारत विश्व गुरू तभी बनेगा जब हमें अपनी सभ्यता, इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी होंगे।
इस अवसर पर दर्शन लाल जैन सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर रिसर्च ऑन सरस्वती रिवर केन्द्र के निदेशक प्रो. एआर चौधरी ने दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि पदमश्री दर्शन लाल जैन के सानिध्य में सरस्वती नदी की ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक, पौराणिकता एवं आध्यात्मिकता आज हम सभी के समक्ष है। उन्होंने कहा कि 120 मिलियन वर्ष पहले सनातन संस्कृति का उद्भव हुआ था।
दीपा नथालिया, रिसर्च ऑफिसर हरियाणा सरस्वती हेरिटेज डेवलेपमेंट बोर्ड ने समापन समारोह में सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस द्वारा ऐतिहासिक सरस्वती नदी के संरक्षण के बारे में जानकारी साझा की। इस अवसर पर डॉ. लक्ष्य बिन्द्रा ने सभी का धन्यवाद व्यक्त किया। इस मौके पर डॉ. एनपी सिंह, प्रो. एके गुप्ता, लक्ष्य जैन एवं डॉ. दीपक जैन, डॉ. महावीर, डॉ. ओपी ठाकुर, डॉ. सतीश, डॉ. योगेन्द्र सिंह, डॉ. राजेश रंगा सहित शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का समारोप मां सरस्वती की आरती के साथ सम्पन्न हुआ।




