जाति आधारित आरक्षण अब राजनीतिक पार्टियों का सत्ता हथियाने का हथियार बन गया है इसे आर्थिक आधार पर पुनर्मूल्याकित करने की जरूरत है ताकि अगली पीढ़ियों पर इसका ग़लत प्रभाव न पड़े : नरेश शर्मा

जाति आधारित आरक्षण अब राजनीतिक पार्टियों का सत्ता हथियाने का हथियार बन गया है इसे आर्थिक आधार पर पुनर्मूल्याकित करने की जरूरत है ताकि अगली पीढ़ियों पर इसका ग़लत प्रभाव न पड़े : नरेश शर्मा
भारतीय मानवाधिकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश शर्मा ने बताया
भारतीय राजनीति मे जातिगत पहचान का इस्तेमाल वोट बैंक और चुनावी जीत के लिए प्रमुखता से किया जा रहा है जिससे सामाजिक विभाजन और असमानता बनी रहती है नेता अक्सर विकास के बजाय जातिगत समीकरणों के आधार पर जनता को प्रभावित करते है जिससे हाशिए के समुदायों को शक्ति मिलती है लेकिन व्यापक सामाजिक भेदभाव भी बना रहता है सभी पार्टियों के नेता जात के नाम पर राजनीति का एक बेहद असरदार हथियार बन चुका है चुनाव के समय नेताओं को न जनता की असली समस्याओं से मतलब होता है और न विकास के मुद्दों से उन्हें सिर्फ यह देखना होता है कि किस जाति में कितने वोटर है और उन्हें कैसे लुभाया जाएं इसी गणित के आधार पर टिकट बंटते है और वादों का पुलिंदा बांटा जाता है
जातीय विभाजन सिर्फ चुनावी मंच पर ही नही बल्कि सरकारी योजनाओं और नीतियों में भी घुसपैठ कर चुका है आरक्षण, नियुक्तियां और यहां तक कि योजनाओं का लाभ भी कई बार जातिगत समीकरणों के हिसाब से बांटा जाता है जिससे समाज में आपसी दूरी और गहरी होती जाती है जनता को जात-पात में उलझा कर नेता अपने लिए सुरक्षित वोट बैंक बना लेते हैं और बाकी मुद्दे पीछे छूट जाते है
सबसे दुखद बात यह है कि यह खेल किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी अपने-अपने तरीके से इस विभाजन की राजनीति करते है फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इसे खुलेआम करते है और कोई थोड़ा पर्दा मे लेकिन नतीजा एक ही है देश एकता की बजाय और बंटता चला जा रहा है और यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक जनता खुद को पहचानकर इसके खिलाफ खड़ी नही होती सभी मानवाधिकार संगठनों ने जात-पात को छोड़कर सभी को एकजुट करने में लगे हुए है




