दिव्या ज्योति जागृती संस्थान द्वारा साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस कार्यक्रम का किया गया आयोजन

(पंजाब) फिरोजपुर 21 सितंबर [कैलाश शर्मा जिला विशेष संवाददाता]=
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा दीपक शर्मा फार्म हाउस में आयोजित साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्य कथा व्यास साध्वी सुश्री भाग्यश्री भारती जी ने गजेन्द्र प्रसंग सुनाते हुए बताया कि गजेन्द्र की कहानी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का प्रतीक है। आज का इंसान भी तो इस संसार में आकर संसार के भोग-विलासो में, रिश्तों-नातों में ही मस्त रहता है। किन्तु जब काल आक्रमण करता है तो कोई भी साथ नहीं देता। क्योंकि संसार के जो रिश्ते हैं, वह स्वार्थ की नींव पर टिके होते हैं। जो सम्बन्ध स्वार्थ की नींव पर टिके होते हैं वह सदा साथ नहीं निभाते। इसलिए क्यों न एक ऐसे शाश्वत रिश्ते की तलाश की जाए, जो ज़िन्दगी को एक मजबूत आधार दे, सुरक्षा दे। जिसके टूट जाने का भय न हो। जो निर्भयता प्रदान कर सके और निर्भयता वही प्रदान कर सकता है, जो स्वयं निर्भय हो। इस संसार में यदि कोई पूर्ण रूपेण निर्भय है तो वह केवल ईश्वर है। इसलिए आवश्यकता है उस ईश्वर को जानने की।
आगे प्रसंग के अंतर्गत साध्वी जी ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण निराकार ब्रह्म है, जो अधर्म ,पाप , अत्याचार के बोझ तले दबी वसुंधरा पर त्रस्त जनमानस की करुण पुकार सुनकर धर्मस्थापना हेतु धरा पर अवतरित होते है। क्योंकि कंस अज्ञानता और तमस्क्रांत साम्राज्य का प्रतीक है। जो मानव मन में जड़े जमाता है, विचारों को संकीर्ण बनाकर बाहरी परिवेश में धर्म के नाम पर हिंसा, जाति पाति के भेद भाव जैसे रूपों में मानव को मानवता से वंचित कर पतन की और मोड़ता है। साध्वी जी ने बताया जिस प्रकार प्रकाश से दूर रहना ही अंधकार है उसी प्रकार प्रभु से दूर रहना ही दुख, संताप व् क्षोभ का कारण है। अवतार शब्द का अर्थ बताते हुए उन्होंने बताया कि अवतार का अर्थ है नीचे उतरना। अपनी परम अवस्था से जन कल्याण के लिए धरा पर उतरा परम तत्व ही ईश्वर अर्थात् अवतार कहलाता है। जहां एक मानव अपने कर्म बंधनों में जकड़ा हुआ, अपने कर्मों के फल को भोगने के लिए इस धरती पर आता है, वहीं पर वह ईश्वर अपनी योग माया के द्वारा प्रकृति को अधीन कर, मानव को सही राह दिखाने के लिए इस धरती पर आते हैं। उन्हें पहचान वही पाता है जिनकी बुद्धि श्रद्धा से पूरित होती है, जो उन्हें तत्त्व से जान लेते हैं। तत्त्व भाव दिव्य दृष्टि के माध्यम से अपने अन्त: करन में परमात्मा का दर्शन करना। कथा में साध्वी बबन भारती जी, साध्वी पुण्य भारती जी, साध्वी सतिंदर भारती जी, साध्वी संदीप भारती जी, साध्वी योगिनी भारती जी, साध्वी पुष्पभद्रा भारती जी, स्वामी बिरजू जी, स्वामी कुलवीरानंद जी ने सुंदर धुनों के साथ मंत्रमुग्ध करने वाले भजनों का गायन किया। गुरु को करिए वंदना भाव से बारम्बार, तीन लोक नव खंड में नाही गुरु सम कोई दातार , जय जय गुरुदेव।। जो तेरे द्वारे आए हो जाए बल्ले बल्ले जैसे भजनों का आनंद उठाया। इस कथा में आज के मुख्य अतिथि रमिंदर आंवला जी ने विशेष रूप में शिरकत की। इसके इलावा दर्शन लाल बांसल, डा. शाम सुंदर बांसल, सोना देवी देवा जी, आर्यन द्विवेदी , संजीव सोनी, रवि शर्मा, गुरसेवक सिंह, अमन सचदेवा, मधु देवा जी, चरणजीत सिंह, जसपाल गुप्ता, धीरज मोंगा, अशोक काजू वाला, रोहित बजाज, लाडा वोहरा भट्ठा प्रधान, डा. धवन, बूड चंद बिंद्रा, इकबाल सिंह, आदर्श धवन, इकबाल गोयल, संदीप वोहरा,कमल कुमार, उडीक चंद बिंद्रा,अजमेर वोहरा, मनीष मोंगा, बिट्टू प्रधान जी भी उपस्थित रहे। अंत में स्वामी सुखदेवानंद जी ने सभी भक्तों का साधुवाद किया। कथा का समापन प्रभु की पावन आरती से किया गया।




