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दिवाली: अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा का एक आध्यात्मिक संदेश

केवल घरों को ही नहीं, हृदयों को भी प्रकाशित करें।

(पंजाब) फिरोजपुर 19 अक्टूबर [कैलाश शर्मा जिला विशेष संवाददाता]=

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा स्थानीय आश्रम में दिवाली का त्यौहार बड़ी धूमधाम और भक्तिभाव से मनाया गया। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी सुश्री अनु भारती जी ने दिवाली के आध्यात्मिक पहलू पर प्रकाश डालते हुए कहा कि
दीपावली, जिसे प्रकाश का पर्व माना जाता है, वास्तव में हमें मानव जीवन के आध्यात्मिक प्रकाश की याद दिलाती है। यह केवल मिट्टी के दीये जलाने का दिन नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर के अंधकार को दूर करने और सत्य के प्रकाश को जगाने का समय है। जिस प्रकार दीपक अंधकार को दूर करते हैं, उसी प्रकार सद्गुरु की शिक्षाएँ और सच्ची भक्ति व्यक्ति के मन से अज्ञान, क्रोध, लोभ और अहंकार के अंधकार को मिटा देती हैं।

साध्वी करमाली भारती जी ने कहा कि प्राचीन काल से ही दिवाली का संदेश यही रहा है कि जिस प्रकार भगवान राम जी रावण को हराकर अयोध्या लौटे थे, उसी प्रकार प्रत्येक जीव को अपने भीतर के रावण – काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार – का नाश करना चाहिए। जब जीव अपने मन को नियंत्रित कर लेता है और पूर्ण संत की कृपा से सत्संग, ध्यान और भक्ति के माध्यम से अपने भीतर के प्रकाश को जागृत करता है, तभी उसकी असली दिवाली होती है।

आज के युग में, जहाँ त्यौहार अक्सर बाहरी चमक-दमक तक सीमित रह जाते हैं, दिवाली हमें सिखाती है कि असली रोशनी दिलों में होनी चाहिए। अगर घर जगमगा रहे हों लेकिन मन में अंधेरा हो, तो वह दिवाली नहीं, बल्कि एक रस्म बनकर रह जाती है।

साध्वी सुनीता भारती जी ने कहा कि हम सभी को मिलकर प्रदूषण मुक्त, “हरित दिवाली” मनानी चाहिए। हरित दिवाली हमें प्रकृति के प्रति ज़िम्मेदार होने की प्रेरणा देती है। धरती माता की रक्षा करना, उसे प्रदूषण से बचाना और पर्यावरण की शुद्धता बनाए रखना – ये सभी भक्ति के महत्वपूर्ण अंग हैं। जब हम पटाखों की जगह दीये जलाते हैं, फिजूलखर्ची की बजाय किसी ज़रूरतमंद की मदद करते हैं, तो हम सिर्फ़ “हरित दिवाली” नहीं, बल्कि “हरि दिवाली” मनाते हैं—यानी ईश्वर के प्रकाश वाली दिवाली।

असली दिवाली वह होती है जब व्यक्ति के भीतर प्रेम, दया, करुणा और सच्चे गुरु के प्रति भक्ति का प्रकाश होता है। जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि असली खुशी धन-दौलत या दिखावे में नहीं, बल्कि ईश्वर के चरणों में रहने में है, तो सच्चे गुरु की कृपा से उसे अपने भीतर आध्यात्मिक प्रकाश की प्राप्ति होती है।

इस दिवाली—सिर्फ़ घरों को ही नहीं, दिलों को भी रोशन करें।
सिर्फ़ मिट्टी के दीये ही नहीं, भक्ति के भी दीये जलाएँ।
धरती माँ की रक्षा करें और हर जीव से प्रेम करें।
यही सच्ची हरित दिवाली है—जहाँ भक्ति का प्रकाश और प्रकृति की सुगंध है।

अंत में गुरु भाई नैंसी जी ने समुद्र भजन संकीर्तन गाया, जिससे संगत मंत्रमुग्ध हो गई।

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