
भाजपा विधायक विनोद चमोली ने सुनाई कहानी
भाजपा विधायक विनोद चमोली की भी राज्य आंदोलन में अहम भूमिका रही है। विनोद चमोली कम उम्र में ही अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में शामिल हो चुके थे देहरादून में वह बड़े आंदोलन को लीड कर रहे थे देहरादून में जहां भी आंदोलन होते थे विनोद चमोली उनमें अहम भूमिका निभाते थे जब उनसे दो अक्टूबर 1994 की घटना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दुखी मन से उसे घटना के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
“आंदोलन के दौरान विनोद चमोली पर लगी थी रासुका’
विनोद चमोली बताते है कि उनकी उम्र 33 वर्ष थी जब उन पर रासुका लगाकर बरेली जेल में भेज दिया गया था बरेली जेल में उन्हें बिल्कुल अलग रखा गया जहां उनके साथ एक आतंकवादी की तरह व्यवहार हो रहा था,न उनसे कोई मिल सकता था और न ही किसी तरह की जानकारी उन तक पहुंच पा रही थी 3 सितंबर 1994 को विनोद चमोली पर रासुका लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया था और उन्हें बरेली की जेल में बंद किया गया जब महीने भर बाद 2 अक्टूबर 1994 की यह घटना हुई तो उनको 4 अक्टूबर को इसकी जानकारी मिली कि मुजफ्फरनगर रामपुर तिराहे पर राज्य आंदोलन के साथ बर्बरता हुई है उन्हें बताया कि उस वक्त जेल के अंदर ही उनका मन बहुत दुःखी हुआ और गुस्सा भी आया।
“बरेली जेल में मिली चमोली को मुजफ्फरनगर कांड की जानकारी”
आगे विनोद चमोली कहते है कि ओबीसी आरक्षण को लेकर उठी चिंगारी ने अलग राज्य की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया 1994 आते-आते यह आंदोलन एक उग्र रूप ले चुका था जो पूरे प्रदेश में चल रहा था। हालांकि 1994 से पहले भी कई बड़े आंदोलन हुए जिनमें कई लोगों की शहादते हुए लेकिन 1994 की घटना सबसे गंभीर और दुखद थी जहां महिलाओं के साथ भी पुलिस कर्मियों ने क्रूरता की। चमोली बताते हैं कि उत्तराखंड के सिर्फ दो ही लोग थे जिन पर इस आंदोलन के दौरान रासुका लगी थी एक पूर्व विधायक राजेंद्र शाह और दूसरे को खुद विनोद चमोली। उन्होंने बताया कि जब उन पर रासुका लगी तो उन्हें बरेली की जेल के नेहरू वार्ड में रखा गया था जहां उनसे कोई नहीं मिल सकता था।
“अभी विकास अधूरा”
2 अक्टूबर 1994 की घटना को आज 29 वर्ष पूरे हो चुके हैं और राज्य बने 23 साल हो चुके है विनोद चमोली कहते हैं कि इन 23 सालों में राज्य में बहुत विकास तो हुआ लेकिन जो होना चाहिए था वह अभी भी अधूरा है। चमोली कहते हैं कि अलग राज्य के लिए आंदोलन धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा था। आंदोलन के दौरान कई ऐसे लोग थे जो इस आंदोलन को अलग रूप देना चाहते थे कुछ माओवादी और राजनीतिक दल के लोग भी इस आंदोलन में शामिल हुए। जो इस आंदोलन को भटकाकर दूसरी दिशा देने में लगे थे। लेकिन प्रदेश के आंदोलनकारियो ने सिर्फ अपना एक ही लक्ष्य रखा अलग राज्य की मांग। पूरे आंदोलन में कभी कोई देश द्रोह जैसी घटना सामने नहीं है। विनोद चमोली यह भी कहते हैं कि आंदोलन के दौरान हजारों लोगों पर लाठियां बरसाई गई आंदोलन में 28 लोगों की मौत भी हुई लेकिन कभी बदले की भावना किसी भी आंदोलनकारी के मन में नहीं आई। सभी का लक्ष्य सिर्फ अलग राज्य बनाना था जिससे पहाड़ी क्षेत्र का बेहतर विकास हो सके लेकिन विनोद चमोली का मन इस बात से आज भी दुखी है कि 29 साल बाद आज भी न्याय नहीं मिल पाया।
“राजनीति में नहीं मिला सही कद”
राज्य आंदोलन के साथ-साथ विनोद चमोली राजनीति से भी जुड़े हुए थे लेकिन उनका मकसद सिर्फ अलग राज्य बनाने का था विनोद चमोली बताते हैं कि इस आंदोलन के जरिए उन्होंने कभी अपने राजनीतिक कैरियर को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की। विनोद चमोली 1985 में बीजेपी के साथ जुड़े थे जो पहली बार बीजेपी के सिंबल कमल पर 1987 में सभासद बने, चमोली कहते हैं कि वह शायद उत्तराखंड के पहले ऐसा नेता हैं जो बीजेपी के सिंबल पर चुनाव लड़ सभासद से लेकर परिषद के अध्यक्ष और मेयर बने और लगातार चुनाव भी जीते, 2017 से दूसरी बार विधायक भी है लेकिन विनोद चमोली को इस बात का थोड़ा दुख है कि उनके अनुभव के अनुसार संगठन उनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है,


