मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है, स्वामी नहींः डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा

मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है, स्वामी नहींः डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा
जैव विविधता संरक्षण से ही सुरक्षित होगा भविष्य : प्रो. सोमनाथ सचदेवा
केयू में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का विधिवत शुभारंभ।
कुरुक्षेत्र, (प्रमोद कौशिक) 12 फरवरी : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा गुरुवार को विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में “इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन बायोडायवर्सिटी एंड क्लाइमेट चेंज: चैलेंजेज एंड मैनेजमेंट” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का विधिवत शुभारंभ हुआ। इस सम्मेलन में देश-विदेश के प्रख्यात वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
उद्घाटन सत्र में हरियाणा स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के चेयरमैन प्रो. कैलाश चन्द्र शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अपने संबोधन में प्रो. शर्मा ने कहा कि मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है, स्वामी नहीं। उन्होंने कहा कि आधुनिक भौतिकवादी समाज ने प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु और संसाधन के भंडार के रूप में देखना शुरू कर दिया है। इस दृष्टिकोण ने मनुष्य को प्रकृति पर वर्चस्व स्थापित करने की मानसिकता दी है, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है।
प्रो. कैलाश चन्द्र शर्मा ने कहा कि यह सोच मानव-केंद्रित ष्टिकोण का परिणाम है, जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से ऊपर समझता है। यह अहंकारी दृष्टिकोण अंततः आत्म-विनाश की ओर ले जाता है, क्योंकि प्रकृति के संतुलन से छेड़छाड़ का दुष्परिणाम मानव समाज को ही भुगतना पड़ता है। जब तक मनुष्य प्रकृति को केवल वैज्ञानिक या आर्थिक दृष्टि से देखता रहेगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है। प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और करुणा का भाव विकसित करना ही सच्चा पारिस्थितिक बदलाव है। उन्होंने कहा कि यदि मानव सभ्यता को स्थायी और सुरक्षित भविष्य चाहिए, तो उसे प्रकृति के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि साझेदारी का मार्ग अपनाना होगा। पारिस्थितिक संतुलन की बहाली ही मानव अस्तित्व की सुरक्षा की गारंटी है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि जैव विविधता संरक्षण से ही धरती पर मनुष्य का भविष्य सुरक्षित होगा। जैव विविधता का नुकसान और जलवायु परिवर्तन अलग-अलग चुनौतियाँ नहीं हैं, बल्कि ये एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए वैश्विक संकट हैं। उन्होंने कहा कि पृथ्वी के समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र जैसे वन, आर्द्रभूमि (वेटलैंड), घासभूमि और महासागर जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इन तंत्रों में से किसी एक को भी नुकसान पहुँचता है, तो इसका असर पूरे पर्यावरण पर पड़ता है।
प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि वनों की कटाई, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ रहा है। जैव विविधता में कमी सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करती है। पेड़ों और महासागरों द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण में कमी आने से वैश्विक तापमान निरंतर बढ़ रहा है जो वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय है। इसके परिणामस्वरूप मौसम में बदलाव, समुद्र स्तर में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी हो रही है। यदि पारिस्थितिक तंत्र में व्यवधान जारी रहा, तो भूमि और समुद्र दोनों के स्तर में गंभीर परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। यह न केवल वन्य जीवन बल्कि मानव जीवन और कृषि व्यवस्था के लिए भी खतरा बन सकता है। प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, वनों का संरक्षण, प्रदूषण में कमी और टिकाऊ विकास नीतियाँ ही इस संकट से निपटने का प्रभावी उपाय हो सकती हैं। उन्होंने सभी नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी निभाने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिवर्ष कम से कम एक पेड़ अवश्य लगाना चाहिए। पेड़ न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वनस्पति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. योगेश कुमार ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि इस दो दिवसीय आयोजन का मुख्य उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों, पारिस्थितिक संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग तथा प्रभावी प्रबंधन पर गहन विचार-विमर्श करना है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें विशेषज्ञ अपने शोध-पत्र प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पोस्टर प्रस्तुतियों के माध्यम से युवा शोधार्थियों को अपने शोध कार्य प्रदर्शित करने का अवसर दिया जाएगा।
प्लेनरी सत्र में प्रो. ओ.पी. धनखड़ ने “ग्लोबल फूड एंड एनर्जी सिक्योरिटी चैलेंजेज अंडर चेंजिंग क्लाइमेट” विषय पर व्याख्यान देते हुए उपयुक्त फसल विकास के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रो. रतन यादव ने वैश्विक जैव विविधता संवर्धन के माध्यम से स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण की आवश्यकता बताई। प्रो. मनोज प्रसाद ने मिलेट्स पर शोध एवं उनकी गुणवत्ता से संबंधित अध्ययन की जानकारी देते हुए मेंटर-मेंटी संबंधों के महत्व को स्पष्ट किया। प्रो. विनोद छोकर ने एलोवेरा के गुण-दोषों तथा सक्रिय यौगिकों पर आधारित शोध पर विस्तार से चर्चा की। अन्य सत्रों में प्रो. डेज़री रानी एवं प्रो. जी.पी. सिंह ने भी अपने विचार साझा किए। विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता प्रो. आर.सी. यादव, प्रो. जितेंद्र शर्मा एवं प्रो. दीपक राय बब्बर ने की। सम्मेलन के सफल आयोजन में विभागाध्यक्ष प्रो. योगेश के नेतृत्व में डॉ. अमिता शर्मा, डॉ. आशीष प्रसाद एवं आयोजन समिति के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अवसर पर डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. राकेश कुमार, प्रॉक्टर प्रो. अनिल गुप्ता, प्रो. अशोक अग्रवाल, प्रो. नरेन्द्र प्रो. योगेश, डॉ. अमिता शर्मा, डॉ. आशीष प्रसाद, प्रो एनके माटा, प्रो. रतन यादव, प्रो. आरसी यादव, प्रो. यशपाल शर्मा, प्रो. जितेन्द्र शर्मा, प्रो. संजीव अग्रवाल, प्रो. जसबीर ढांडा, प्रो. सुनीता दलाल, प्रो. परमेश कुमार सहित गणमान्य लोग मौजूद थे।




