लुवास द्वारा झज्जर के ढाणा (साल्हावास) गांव में अनुसूचित जाति पशुपालकों हेतु डेयरी प्रशिक्षण गोष्ठी का सफल आयोजन

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक
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हिसार,22 मार्च : ग्रामीण भारत में पशुपालन केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक विकास का आधार भी है। हरियाणा जैसे राज्य, जहाँ दुग्ध उत्पादन और डेयरी व्यवसाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, वहाँ वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए लाला लाजपत राय पशुचिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास), हिसार ने झज्जर जिले के ढाणा (साल्हावास) गांव में अनुसूचित जाति वर्ग के पशुपालकों के लिए एक दिवसीय डेयरी प्रशिक्षण गोष्ठी का आयोजन किया।
यह कार्यक्रम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), भारत सरकार के भैंस नस्ल सुधार परियोजना के अंतर्गत आयोजित हुआ। इसका मुख्य लक्ष्य ग्रामीण पशुपालकों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करना और उनकी आय में वृद्धि सुनिश्चित करना था।
लुवास विश्वविद्यालय लंबे समय से ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों को प्रशिक्षण देने और उन्हें वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कार्यरत है ताकि वे भी आधुनिक डेयरी प्रबंधन की तकनीकों से लाभान्वित हो सकें।
कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) विनोद कुमार वर्मा के मार्गदर्शन में हुआ। पशु प्रबंधन विभागाध्यक्ष डॉ. डी. एस. बिढान और हरियाणा पशु विज्ञान केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. संजय यादव ने इसकी देखरेख की।
गोष्ठी में विभिन्न विशेषज्ञों ने अलग-अलग विषयों पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किए।डॉ. दीपिन चन्द्र यादव ने बताया कि पशुओं को स्वच्छ, हवादार और आरामदायक वातावरण उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने संतुलित आहार की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि हरा चारा, सूखा चारा, दाना मिश्रण और खनिज मिश्रण का उचित अनुपात दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है।डॉ. जगत कादयान ने स्वच्छ दूध उत्पादन की वैज्ञानिक विधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दुग्ध दुहने से पहले और बाद में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इससे न केवल दूध की गुणवत्ता बढ़ती है, बल्कि बाजार में बेहतर मूल्य भी प्राप्त होता है।डॉ. दिनेश गुलिया ने थन की स्वच्छता और दुग्ध संग्रहण के मानकों पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सही तरीके से दुग्ध दुहने से संक्रमण का खतरा कम होता है और दूध की गुणवत्ता बनी रहती है।डॉ. अमित पूनिया और डॉ. निलेश सिंधु ने डेयरी पशुओं में होने वाली प्रमुख बीमारियों, उनके लक्षण और नियंत्रण उपायों पर चर्चा की। उन्होंने पशुपालकों को नियमित टीकाकरण की आवश्यकता पास ज़ोर और स्वास्थ्य जांच और स्वच्छता बनाए रखने की सलाह दी।
इस अवसर पर झज्जर के पशुपालन विभाग के एसडीओ डॉ संजीव कुमार सहरावत ने गोष्ठी में पशुपालकों को हरियाणा सरकार की डेयरी विकास योजनाओं के बारे में भी बताया गया। उन्होंने समझाया कि सरकार द्वारा पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका लाभ उठाकर वे अपने व्यवसाय का विस्तार कर सकते हैं।
गोष्ठी की विशेषता रही कि पशुपालकों ने विशेषज्ञों से खुलकर संवाद किया। उन्होंने अपनी समस्याएँ साझा कीं और व्यावहारिक समाधान प्राप्त किए। इस संवाद से प्रशिक्षण का वास्तविक लाभ सुनिश्चित हुआ।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को खनिज मिश्रण और अन्य उपयोगी सामग्री वितरित की गई। इससे पशुपालक अपने पशुओं के पोषण स्तर को बेहतर बनाने में प्रोत्साहित हो सकेंगे।
जनसंपर्क अधिकारी डॉ नीलेश सिंधु के अनुसार इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल तकनीकी जानकारी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि ग्रामीण समाज में आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की भावना भी जगाते हैं। गोष्ठी का सफल आयोजन इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक पशुपालन अपनाने की अपार संभावनाएँ हैं। इस अवसर पर पशु चिकित्सक डॉ. पुष्पेन्द्र जाखड़, डॉ. अनुराग, डॉ. प्रिंस तोमर एवं डॉ. अरविंद कोड़ान ने आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जाते रहेंगे, जिससे अधिक से अधिक पशुपालक आधुनिक तकनीकों से जुड़ सकें और आत्मनिर्भर बन सकें।



