भारत के अध्यात्म एवं संस्कृति की विश्व में पहचान : स्वामी ज्ञानानंद महाराज

कुरुक्षेत्र आस्था, इतिहास और संघर्ष की जीवंत धरोहर : पद्मश्री प्रो. रघुवेन्द्र तंवर।
गीता में मानव जीवन के प्रत्येक द्वंद्व का समाधान :प्रो. सोमनाथ सचदेवा।
भारतीय इतिहास में स्थान और काल के संयोजन को समझना भी बेहद जरूरी : डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री।
विश्व के महान दार्शनिकों ने ली गीता से शिक्षा : प्रो. हीरामन तिवारी।
हमारा इतिहास अत्यंत गौरवशाली : प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा।
केयू में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ।
कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत पर हुआ मंथन।

थानेसर, प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 8 अप्रैल : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में “कुरुक्षेत्रः थ्रू द एजेस” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का बुधवार को विधिवत शुभारंभ किया गया। इस सम्मेलन का आयोजन भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर), नई दिल्ली, श्रीमद भगवद गीता अध्ययन केंद्र, स्वदेशी शोध संस्थान, जिओ गीता तथा विजन कुरुक्षेत्र के सहयोग से किया जा रहा है, जबकि इसकी फंडिंग आईसीएचआर, नई दिल्ली द्वारा की जा रही है।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि भारत के अध्यात्म एवं संस्कृति की विश्व में विशिष्ट पहचान है। श्रीमद्भागवत गीता का महत्व अत्यंत व्यापक और गहरा है। विश्व के अनेक चिंतकों और दार्शनिकों ने इसकी उदारता और सार्वभौमिक दृष्टि को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि गीता में केवल आध्यात्मिकता का गहन दर्शन ही नहीं मिलता, बल्कि उसमें राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक कर्तव्य, नैतिकता और लोक कल्याण जैसे मूल्यों का भी उच्च चिंतन निहित है।
स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि गीता में राष्ट्रवाद का भी अलौकिक चिंतन निहित है, जो व्यक्ति को केवल अपने हित तक सीमित नहीं रखता, बल्कि समाज, राष्ट्र और मानवता के व्यापक कल्याण के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कुरुक्षेत्र के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि कुरुक्षेत्र को उसके ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के अनुरूप पर्यटन और तीर्थ स्थल के रूप में वह स्थान अभी तक पूर्ण रूप से नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तव में अधिकारी है। उन्होंने कहा कि तीर्थ के रूप में कुरुक्षेत्र का महत्व चार धाम से कम नहीं है। यह वही पावन भूमि है जहाँ महाभारत का महान युद्ध हुआ और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया, जिसने पूरी मानवता को धर्म, कर्म और सत्य का मार्ग दिखाया।
स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि इसके बावजूद कुरुक्षेत्र को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए अभी भी पर्याप्त प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और गीता के सार्वभौमिक संदेश को विश्व के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ भी इस महान परंपरा से प्रेरणा ले सकें और भारतीय संस्कृति के इस अमूल्य धरोहर को समझ सकें।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के अध्यात्म एवं संस्कृति की विश्व में पहचान है। श्रीमद्भगवद्गीता का महत्व अत्यंत व्यापक और गहरा है। विश्व के अनेक चिंतकों और दार्शनिकों ने इसकी उदारता और सार्वभौमिक दृष्टि को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि गीता में केवल आध्यात्मिकता का गहन दर्शन ही नहीं मिलता, बल्कि उसमें राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक कर्तव्य, नैतिकता और लोककल्याण जैसे मूल्यों का भी उच्च चिंतन निहित है। ये सिद्धांत किसी भी समाज और राष्ट्र के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने अपने वक्तव्य में कुरुक्षेत्र के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि कुरुक्षेत्र को उसके ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के अनुरूप पर्यटन और तीर्थ स्थल के रूप में वह स्थान नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तव में अधिकारी है। यह वही पावन भूमि है जहाँ महाभारत का महान युद्ध हुआ और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया, जिसने पूरी मानवता को धर्म, कर्म और सत्य का मार्ग दिखाया।
स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि इसके बावजूद कुरुक्षेत्र को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए अभी भी पर्याप्त प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और गीता के सार्वभौमिक संदेश को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ भी इस महान परंपरा से प्रेरणा ले सकें। सम्मेलन के निदेशक एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष प्रो. भगत सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत की।
पद्मश्री प्रो. (डॉ.) राघवेंद्र तंवर, अध्यक्ष, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने कहा कि कुरुक्षेत्र केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संघर्ष की जीवंत धरोहर है। इतिहास को समझने के लिए केवल धार्मिक दृष्टि पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक आयामों को भी समझना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि शिवालिक पर्वतमाला, हिमालय और राजस्थान के बीच स्थित तथा गंगा घाटी के निकट होने के कारण यह क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ रहा है। इसी कारण यहाँ कृषि, व्यापार और सामाजिक संरचना का विकास हुआ, जिसने इसे आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाया। उन्होंने सम्राट हर्षवर्धन के समय का उल्लेख करते हुए कहा कि उस काल में कुरुक्षेत्र विशेष रूप से सूर्यग्रहण के अवसर पर विशाल धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था, जहाँ देश-विदेश से लोग एकत्रित होकर स्नान, दान और धार्मिक अनुष्ठान करते थे।
प्रो. तंवर ने विदेशी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत का भी उल्लेख किया, जिसमें कुरुक्षेत्र और थानेसर क्षेत्र के समाज, कृषि व्यवस्था, शिक्षा और जनजीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है। उन्होंने कहा कि ऐसे विवरण इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को प्रमाणिक रूप से सामने लाते हैं। उन्होंने आगे कहा कि समय के साथ इस क्षेत्र ने अनेक उतार-चढ़ाव भी देखे हैं। 1803 में दिल्ली पर अंग्रेजों के अधिकार के बाद प्रशासनिक ढांचे में बदलाव आए और धीरे-धीरे क्षेत्र का पुनर्विकास हुआ। बाद में 1947 के भारत विभाजन के समय यह क्षेत्र शरणार्थियों के पुनर्वास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना, जहाँ बड़ी संख्या में लोगों ने आकर नया जीवन शुरू किया। प्रो. तंवर ने कुरुक्षेत्र की शैक्षणिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की स्थापना इस क्षेत्र के बौद्धिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी। प्रारंभिक वर्षों में संसाधन सीमित होने के बावजूद आज यह विश्वविद्यालय एक प्रमुख शैक्षणिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र के समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक विरासत को संरक्षित और व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करने के लिए एक समर्पित “कुरुक्षेत्र संग्रहालय” की स्थापना नितांत आवश्यक है। ऐसा संग्रहालय न केवल इस क्षेत्र के बहुआयामी इतिहास को प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और शोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बनेगा।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता ऐसा महान ग्रंथ है जो मानव जीवन के प्रत्येक द्वंद्व का समाधान प्रस्तुत करती है। यह केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन ही नहीं देती, बल्कि जीवन के हर पहलू कर्तव्य, नैतिकता, संघर्ष और आत्मबोध को स्पर्श करती है।” कुरुक्षेत्र भारतीय इतिहास और संस्कृति का मूल केंद्र रहा है।” प्रो. सचदेवा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले उनका मानना था कि केवल साइंस और अप्लाइड साइंस ही अधिक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक विज्ञान, ह्यूमैनिटीज़ और भाषाओं के विभागों के साथ निकट संपर्क में आने के बाद उनका दृष्टिकोण बदला है। उन्होंने कहा कि साइंस और अप्लाइड साइंस शरीर के समान हैं, जबकि ह्यूमैनिटीज़ और सोशल साइंस उसमें आत्मा का कार्य करते हैं। इसलिए विश्वविद्यालयों में इन सभी विषयों के बीच संतुलन और समन्वय अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल तकनीकी ज्ञान देना नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और इतिहास के प्रति जागरूक नागरिक तैयार करना भी है। इसी समन्वित दृष्टि से ही शिक्षा और समाज दोनों का समग्र विकास संभव है। उन्होंने कहा कि “कुरुक्षेत्रः थ्रू द एजेस” जैसे सम्मेलन कुरुक्षेत्र की बहुआयामी ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, उपाध्यक्ष, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, पंचकूला ने कहा कि इतिहास केवल लिखित ग्रंथों तक सीमित नहीं होता, बल्कि मौखिक परंपराएं, अभिलेख, लोककथाएं और पौराणिक स्रोत भी इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को समग्र रूप में समझने के लिए इन सभी स्रोतों का समुचित अध्ययन और संदर्भ के आधार पर विश्लेषण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास में स्थान और काल के संयोजन को समझना भी बेहद जरूरी है। सिंधु और सरस्वती क्षेत्रों की सभ्यता का अध्ययन हमें प्राचीन भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को समझने में मदद करता है। इससे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य प्राचीन सभ्यता केंद्रों को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
डॉ. अग्निहोत्री ने कुरुक्षेत्र को संवाद और चिंतन की भूमि बताते हुए कहा कि यह केवल युद्धभूमि नहीं, बल्कि विचार-विमर्श और ज्ञान परंपरा का केंद्र भी रहा है। उन्होंने महाभारत और गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि जब तक मन में संदेह रहता है, तब तक व्यक्ति अपने कर्तव्य का सही पालन नहीं कर सकता। गीता का संवाद इसी संदेह को दूर करने का प्रयास है। उन्होंने गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संवाद की परंपरा भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है। कुरुक्षेत्र संवाद की धरती है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता का प्रभाव विश्वभर के चिंतकों पर पड़ा है। विदेशी विद्वानों ने भी इसके दार्शनिक विचारों का सम्मान किया है। उन्होंने कहा कि इतिहास में ऐसे दौर भी आए जब भारतीय ग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं से लोगों को दूर करने के प्रयास किए गए, लेकिन आज फिर से समाज में अपनी जड़ों और परंपराओं को समझने की रुचि बढ़ रही है।
प्रो. हीरामन तिवारी, सेंटर ऑफ हिस्टोरिकल स्टडीज, जेएनयू ने कहा कि विश्व के महान दार्शनिकों ने भी गीता से शिक्षा ली है। भगवद्गीता महाभारत का अभिन्न हिस्सा होने के बावजूद अपनी अद्वितीय पहचान रखती है। भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, कर्तव्य, नैतिकता और आध्यात्मिकता का सार्वभौमिक दर्शन प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक महान दार्शनिकों, चिंतकों और विद्वानों ने भी गीता से गहरी प्रेरणा प्राप्त की। यह ग्रंथ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक और वैश्विक महत्व का स्रोत है।
प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली ने कहा कि हमारा इतिहास गौरवशाली रहा है। अग्नि सूत्र और अग्नि मंथन जैसी परम्पराएं इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान हैं।यह प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या हमारा इतिहास केवल महाभारत काल से ही आरंभ माना जाएगा, या हम उससे पहले के कालखंडों का भी सम्यक और गंभीर अध्ययन करेंगे। यह कोई साधारण विषय नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास की व्यापकता और प्राचीनता को समझने से जुड़ा हुआ प्रश्न है। आज विश्व स्तर पर भी वेदों को मानव सभ्यता के प्राचीनतम और महत्वपूर्ण ग्रंथों के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने इतिहास और परंपराओं के प्रति किसी प्रकार का संकोच या संदेह नहीं होना चाहिए। वेदों में निहित ज्ञान केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि विज्ञान, समाज, दर्शन और जीवन मूल्यों से भी समृद्ध है।
विजन कुरुक्षेत्र के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि कुरुक्षेत्र, जिसे धर्म, इतिहास और संस्कृति की पावन भूमि माना जाता है, अपनी समृद्ध सभ्यता के बावजूद आज एक समग्र पहचान के अभाव से जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की विरासत को संगठित और व्यापक रूप में सामने लाने की आवश्यकता है। अंत में सभी अतिथियों का आभार आयोजन सचिव प्रो. आरके देसवाल ने किया।
इस अवसर पर प्रो. ऋ़चा तंवर, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार तुषार सैनी, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. राकेश कुमार, डॉ. अमरजीत लोचन, डॉ. एके गुप्ता, डॉ. एनपी सिंह, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी, प्रो. दिनेश राणा, प्रो. एसके चहल, प्रो. तेजेन्द्र शर्मा, प्रो. कुसुम लता, प्रो. नीरा राघव, प्रो. रमेश दलाल, डॉ. जितेन्द्र खटकड़, डॉ. धर्मवीर, प्रो. राजपाल, प्रो. शुचिस्मिता, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, उप-निदेशक डॉ. जिम्मी शर्मा प्रो. अमित लूदरी, डॉ. रविन्द्र बलियाला, धर्मवीर मिर्जापुर, डॉ. कृष्णा, डॉ आबिद अली, डॉ. जितेन्द्र जांगडा सहित शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद थे।

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