संबोधि मे जीते हुए ब्रह्म के सुमिरन मे जीना है : समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक
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कुरुक्षेत्र,21 मार्च : श्री दुर्गा देवी मन्दिर पिपली, कुरुक्षेत्र के पीठाधीश और समर्थगुरू मैत्री संघ हिमाचल के जोनल कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि संपूर्ण भारत और विदेशों के ओशो प्रेमियों और समर्थगुरू धाम, मुरथल हरियाणा में समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी के सान्निध्य में परमगुरु ओशो का संबोधि दिवस 21 मार्च को धूमधाम से मनाया गया।
21 मार्च, 1953 को एक विशेष वृक्ष ‘‘मौलश्री’’ के नीचे ओशो को संबोधि प्राप्त हुई।
ओशो जिनका न कभी जन्म हुआ और न ही मृत्यु।
11 दिसम्बर 1931 और 19 जनवरी 1990 के बीच जो इस पृथ्वी ग्रह पर केवल विचरण करने आए।
ओशो व्यक्ति भी है और समष्टि भी। वे हमारे सदगुरू भी हैं और परमगुरु भी। वे अपने पूर्व की समस्त आध्यात्मिक परंपराओं के प्रस्तोता भी हैं और एक नई आध्यात्मिक परंपरा के प्रवर्तक भी। समर्थगुरू धारा के हिमालय परमगुरु ओशो है।
ओशो ने ताओ: दि गोल्डन गेट भाग 1, अध्याय 2 में बताया कि “एक जीवित सदगुरू की उपस्थिति में ही ये विधियां कार्य करती है ,अकेली विधियां कोई कार्य नहीं करतीं। और यही विज्ञान व धर्म में भेद है। धर्म एक जादू है ; धर्म एक रहस्य है। विज्ञान विधियों पर निर्भर है, धर्म सदगुरुओं पर निर्भर है।
धर्म उनकी उपस्थिति पर निर्भर है जो कि जाग गए हैं। ” जीवित सदगुरू पूर्ण सदगुरु समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया जी के निर्देशन में समर्थगुरू धारा गंगा के समान ध्यान, योग, सुमिरन और प्रज्ञा कार्यक्रम के द्वारा जनमानस को लाभ प्रदान कर रही है।
ट्वीटर के माध्यम से आदरणीय समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया ने बताया कि ओशो कहते हैं संबोधि एक तरह से जीवन का पूरा रूपान्तरण है और संबोधि के बाद भी यात्रा है,वह यात्रा भक्ति है।
हमेशा याद रखना है कि संबोधि को प्राप्त करना है,संबोधि मे जीना है और संबोधि मे जीते हुए, ब्रह्म के सुमिरन मे जीना है, यही समर्थगुरु धारा का मार्ग है।
साक्षी हो कर जग को देखो, है ओशो का अनुदान महा।
है योगी वन में कहाँ चले,जो खोज रहे क्या नहीं यहाँ।
भीतर बाहर सब ओर वही,उसका न ओर या छोर कहीं।
आकाशं शरणं गच्छामि,
गोविन्दं शरणं गच्छामि।



