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MP, मऊगंज,“सीतापुर का जंगल विभाग बना दलालों का अड्डा, अफसरों ने ओढ़ ली चुप्पी की चादर

स्टेट हेड /राहुल कुशवाहा मध्य प्रदेश,,8889284934

मऊगंज जिले के सीतापुर क्षेत्र में वन विभाग भ्रष्टाचार की नई इबारत लिख रहा है। अधिकारियों की कार्यशैली पर अब सीधे-सीधे सवाल उठ रहे हैं — सवाल जवाबदेही के, और उनके ‘दलाली प्रेम’ के। मंगलवार सुबह जब पत्थर और पटिया लदा एक ट्रैक्टर रोड किनारे खड़ा मिला, तो स्थानीय मीडिया ने विभागीय अधिकारियों से संपर्क करना चाहा। लेकिन कोई भी अधिकारी फोन उठाने को तैयार नहीं हुआ। यह वही अधिकारी हैं जो जब भी घोटाले की भनक मिलती है, “रिश्ते और व्यवहार” की ढाल लेकर भाग खड़े होते हैं।

“दलाल तंत्र” से चल रहा पूरा विभाग!

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, बहेराडाबर और आसपास की पहाड़ियों में चल रहे अवैध खनन को रोकने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। कारण? क्योंकि मऊगंज से ही कुछ खास ‘दलालों’ को पहले से जानकारी दे दी जाती है — “अधिकारी आ रहे हैं, सावधान हो जाओ!”
यानी सरकारी वर्दी अब दलालों की लुंगी बन चुकी है।30 हज़ार में ईमान बिकता है साहब! रेंजर और मुंशी की जोड़ी खुलेआम ट्रैक्टर चालकों से डील करती है। सूत्रों के मुताबिक़ जानकारी मिली 30 से 50 हज़ार रुपये की रकम देकर अवैध सामग्री से लदे ट्रैक्टर बिना चालान और जब्ती के छोड़ दिए जाते हैं।

अफसर नहीं, दलाल हैं ये लोग!

इन अधिकारियों ने कुर्सी को कर्तव्य का मंच नहीं, दलाली का धंधा बना दिया है। मीडिया जब भ्रष्टाचार की सूचना देना चाहता है, तब भी ये फोन उठाने की जहमत नहीं उठाते। जैसे जंगल विभाग कोई राजमहल हो और ये खुद को राजा समझ बैठे हों।

प्रशासन की चुप्पी = मौन सहमति?
• क्या DFO को सब पता नहीं चलता?
• या फिर सब जानते हैं और चुप रहकर हिस्सेदारी निभा रहे हैं?

“अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ संकेत है कि जंगल और जनता — दोनों को लूटने की छूट दी जा चुकी है।”

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा:

“ये अफसर नहीं, सूट-बूट में दलाल हैं साहब! इनको चूड़ियां पहनाकर घर भेज दो। जंगल का सौदा करने वालों पर रहम करना भी अपराध है।”

क्या सरकार जवाब देगी?

क्या इन भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई होगी या यह भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा?

सरकार से सीधा सवाल:
“क्या अब भी भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई नहीं होगी?”*

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