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हरियाणा मॉडल: जनविश्वास, जनकल्याण और जनविकास

डॉ. राज नेहरू
महानिदेशक, स्वर्ण जयंती हरियाणा इंस्टीट्यूट फॉर फिस्कल मैनेजमेंट एवं मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी

कुरुक्षेत्र, (प्रमोद कौशिक) : प्राचीन ग्रंथ कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है, “प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥” अर्थात प्रजा की खुशी में ही राजा की खुशी है; उनकी भलाई में ही उसकी भलाई। जो उसे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लगे, उसे ही अच्छा न मानकर, जो प्रजा को अच्छा लगे, उसे ही हितकारी समझे। यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। सच्चा शासन व्यक्तिगत सत्ता या क्षणिक लाभ के बारे में नहीं, बल्कि ऐसी संस्थाओं के निर्माण के बारे में है जो हर नागरिक के स्तर ऊपर उठाएं, समृद्धि का प्रसार करें और न्याय सुनिश्चित करें। इतिहास गवाह है कि जब नेता इस भावना को अपनाते हैं, अनुशासन और क्रियान्वयन की ओर बढ़ते हैं, तो समाज में गहरा बदलाव आता है। संभावनाएं प्रगति में बदल जाती हैं और ठहराव सतत विकास में तब्दील हो जाता है।
हरियाणा इसी प्रजा-केंद्रित शासन की मिसाल है। कुदरती तौर पर हरियाणा कई के पास कई उपलब्धियां हैं। उपजाऊ भूमि, अच्छा पानी, भौगोलिकता भी बेहतरीन। राष्ट्रीय राजधानी से निकटता, लेकिन लंबे समय तक यह अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाया। आर्थिक विकास कुछ शहरी केंद्रों जैसे गुरुग्राम और फरीदाबाद तक सीमित रहा, जबकि ग्रामीण हरियाणा के बड़े हिस्से बिजली की अनियमितता, रोजगार की कमी और कमजोर सार्वजनिक सेवाओं से जूझते रहे। युवा भर्ती प्रक्रियाओं की अस्पष्टता से निराश होते थे और पर्ची-खर्ची के आक्षेप लगते थे। किसान बुनियादी ढांचे की अनिश्चितता से परेशान थे और आम नागरिक प्रशासन को दूर और पहुंच से बाहर महसूस करते थे। सार्वजनिक ऋण बढ़ता जा रहा था, मुख्य रूप से गैर-उत्पादक खर्चों से। सामाजिक चुनौतियां गहरी थीं, 2014 में जन्म के समय लिंग अनुपात मात्र 871 था, स्वास्थ्य सेवाओं में कमी थी। रोजगार आकांक्षाओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा था और पक्षपात के आरोपों ने जनता का भरोसा धीरे-धीरे कम किया। कुल मिलाकर, संसाधन तो बहुत थे, लेकिन संस्थाएं कमजोर; विकास था, लेकिन समावेशी नहीं; वादे थे, लेकिन प्रभावी शासन नहीं।
इस अनदेखी क्षमता के बीच एक नई नेतृत्व दृष्टि की जरूरत थी, ईमानदारी, पारदर्शिता और जनकल्याण के प्रति अटूट प्रतिबद्धता वाली। 2014 से जब भाजपा सत्ता में आई, तो मनोहर लाल खट्टर और अब नायब सिंह सैनी ने लगातार इस दिशा में काम किया। उनका उद्देश्य स्पष्ट था, ईमानदार, जवाबदेह शासन, जहां योग्यता हावी हो, भ्रष्टाचार को कोई जगह न मिले और हर नागरिक की प्रगति ही सफलता का पैमाना बने। मनोहर लाल खट्टर का कार्यकाल जीवनभर की निस्वार्थ सेवा, नैतिक आचरण और पक्षपात के प्रति जीरो टॉलरेंस से बना था। उन्होंने पारदर्शिता को प्रशासन की नींव बनाया। वे अक्सर कहते थे कि जनता का भरोसा, जीरो भ्रष्टाचार और योग्यता-आधारित अवसरों में, सरकार की सबसे बड़ी ताकत है। इस नींव पर नायब सिंह सैनी ने और मजबूती दी। उन्होंने अच्छे शासन, पारदर्शी भर्ती, समय पर सेवा वितरण और जनता के प्रति संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी। हर अधिकारी के लिए जनसेवा सर्वोपरि हो, यह सुनिश्चित किया। दोनों नेताओं की एकसमान दृष्टि ने राज्य में दिशा दी, युवाओं और निवेशकों में गहरा भरोसा बहाल किया और समावेशी, परिणाम-उन्मुख विकास की नई लहर शुरू की।
2015 के राज्य वित्त पर व्हाइट पेपर ने कांग्रेस के दस साल के अंत में गहरी समस्याओं को उजागर किया था। राज्य की अपनी आय का हिस्सा घटकर 80.4% रह गया था (2004-05 में 89.5% से), केंद्रीय अनुदान पर निर्भरता बढ़ी, बिजली निगम डिस्कॉम घाटे में डूबे (2013-14 में राष्ट्रीय स्तर पर 67,000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान), भर्तियां अस्पष्ट और मुकदमेबाजी वाली, औद्योगिक विकास गुरुग्राम तक सीमित और सामाजिक संकेतक कमजोर (जन्म लिंग अनुपात 871)। भाजपा सरकार ने व्यवस्थित, संस्थागत सुधारों से इन समस्याओं का सीधा सामना किया। हरियाणा स्टाफ सेलेक्शन कमीशन जैसी संस्थाओं से पारदर्शी, योग्यता-आधारित भर्ती ने सरकारी नौकरियां दोगुनी से ज्यादा कर दीं, 2004-14 में लगभग 86,000 से 2014-2024 में 1.43 लाख से अधिक। मुकदमेबाजी घटी और युवाओं का भरोसा लौटा। आज जिलों में युवा सरकारी कर्मचारियों से बात करें तो वे बार-बार यही कहते हैं, पहली बार चयन पूरी तरह योग्यता पर हुआ, बिना राजनीतिक संरक्षण या पैसे के। बिचौलियों और रिश्वत के बिना न सिर्फ व्यवस्था पर भरोसा लौटा, बल्कि सरकारी नौकरी की गरिमा भी बहाल हुई।
2015-2025 में 24.35 लाख रोजगार सृजित हुए। कुल कार्यबल 86.34 लाख से बढ़कर 110.69 लाख हुआ। 25,000 रुपये से ज्यादा कमाने वालों की संख्या दोगुनी हो गई, वेतनभोगी और स्व-रोजगार दोनों में। पहले दशक में कृषि से मजबूरी में पलायन तेज था, लेकिन 2015-25 में यह काफी धीमा हुआ। अब श्रमिकों का आवागमन संरचनात्मक और अवसर-आधारित है, न कि मजबूरी से। कृषि में हरियाणा सरकार ने किसान कल्याण, आय स्थिरता और सतत अभ्यासों को प्राथमिकता दी। हरियाणा राज्य देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां किसानों द्वारा उगाई गई सभी 24 फसलों की एमएसपी पर खरीद होती है, इससे 12 लाख से ज्यादा किसान लाभान्वित हुए। भावांतर भरपाई, मेरा पानी मेरी विरासत, ई-क्षतिपूर्ति जैसी योजनाओं से फसल आय दोगुनी करने में मदद मिली। मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड, फसल बीमा योजना, कृषि सिंचाई योजना ने किसानों का कृषि में विश्वास बढ़ाया।
शिक्षा क्षेत्र में रणनीतिक निवेश हुए। 16 से ज्यादा हैं, स्किल डेवलपमेंट, स्पोर्ट्स, संस्कृत, डिजाइन और आयुर्वेद पर फोकस किया गया है। कॉलेज 20 किमी और स्कूल 10 किमी के दायरे में स्थापित करने की नीति से शिक्षा की पहुंच बढ़ी। ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 33% तक पहुंचा। ग्रामीण-समी-शहरी इलाकों में कॉलेजों की पहुंच से जीवन बदल गए। माता-पिता बताते हैं कि पहले स्कूल के बाद बेटियां पढ़ाई छोड़ देती थीं, अब घर से दूर न जाकर उच्च शिक्षा ले रही हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए लाडो लक्ष्मी और हर घर हर ग्रहणी जैसी योजनाएं शुरू हुईं।
आर्थिक रूप से राज्य का जीएसडीपी वर्तमान मूल्यों पर तीन गुना से ज्यादा बढ़ा, 2013-14 में 3.99 लाख करोड़ से 2024-25 में 12.16 लाख करोड़ तक। विकास गुरुग्राम से आगे फैला—एक्सप्रेसवे, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और विविध निवेश से। एचएसआईआईडीसी और राज्य सरकार के प्रयासों से हरियाणा वैश्विक और राष्ट्रीय कंपनियों का पसंदीदा गंतव्य बना। मारुति सुजुकी (18,000 करोड़), एटीएल बैटरी (7,197 करोड़), सुजुकी मोटरसाइकिल (1,466 करोड़), ग्रासिम (1,140 करोड़), फ्लिपकार्ट (1,389 करोड़) जैसे बड़े निवेश आए। टोयोटा, उनो मिंडा ने विस्तार किया। युफ्लेक्स, अमूल, फैवले ट्रांसपोर्ट जैसे निवेशक आए। 2019-2024 में 3,100 से ज्यादा इंडस्ट्रियल प्लॉट आवंटित, 50,000 करोड़ से ज्यादा निवेश की संभावना। प्रति व्यक्ति आय दोगुनी से ज्यादा हुई, राष्ट्रीय औसत से 70% ज्यादा। केंद्रीय अनुदान का हिस्सा 11% से घटकर 6.45% हुआ, आत्मनिर्भरता बढ़ी। एमएसएमई उद्यम 5.20 लाख से बढ़कर 20 लाख से ज्यादा, 38 लाख नई नौकरियां बनीं।
बिजली क्षेत्र में सुधारों से घाटे वाली डिस्कॉम लाभ में आईं। 2015-25 में एटीएंडसी घाटा 30% से घटकर 10% हुआ। 5,800 से ज्यादा गांवों में 24 घंटे सातों दिन बिजली पहुंची। जगमग योजना से देहात जगमगाया। सामाजिक बदलाव भी उल्लेखनीय है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ से जन्म लिंग अनुपात 871 से बढ़कर 2025 में 923 हुआ, पांच साल में सर्वाधिक। मेडिकल शिक्षा क्षमता 700 एमबीबीएस सीटों से 2,185 से ज्यादा। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता बताती हैं कि लड़की के जन्म पर अब गांवों में खुशी मनाई जाती है, पहले की झिझक गायब हो गई।
शासन को डिजिटल किया, एसएआरएएल पोर्टल से 600 से अधिक सेवाएं ऑनलाइन करने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। वित्तीय अनुशासन से प्रदेश की आय बढ़ी, केंद्रीय अनुदान पर निर्भरता घटी। ऋण प्रबंधनीय, पूंजीगत खर्च बढ़ा। एसडीजी संकेतकों में सुधार हुआ है; 2018 में 55 से 2024 में 72 तक। आयुष्मान भारत और चिरायु से आधी आबादी को स्वास्थ्य बीमा, स्वास्थ्य खर्च कम। शिशु मृत्यु दर घटी, संस्थागत प्रसव आम, राज्य ओडीएफ। स्टार्टअप इकोसिस्टम जीवंत रूप में सामने आया, लगभग 10,000 स्टार्टअप, युवाओं में आकांक्षा और नवाचार का भाव लेकर आया।
हरियाणा का यह परिवर्तन व्यक्तिगत शासन से संस्थागत, पारदर्शी और परफॉर्मेंस-आधारित मॉडल में बदलाव है। नैतिक नेतृत्व, योग्यता-आधारित व्यवस्था, वित्तीय अनुशासन और तकनीक से जनसेवा ने जनभरोसा मजबूत किया। भर्ती, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक नीति में सुधारों से रोजगार बढ़ा, निवेश आया, मानव पूंजी मजबूत हुई, वित्तीय स्थिरता आई। ईमानदारी, रणनीतिक बुनियादी ढांचे और सामाजिक निवेश से हरियाणा एक लचीला, समावेशी और भविष्य- तैयार विकास मॉडल बन गया, आर्थिक विस्तार के साथ सामाजिक न्याय और स्थिरता का संतुलन पैदा हुआ है। हरियाणा का यह विकास मॉडल आज देश बाहर में एक आदर्श बन गया है।

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