सरस्वती नदी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का केन्द्र : प्रो. वीरेन्द्र पाल

दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के तकनीकी सत्रों में विद्वतजनों ने सरस्वती नदी को लेकर अपने विचार किए साझा।
कुरुक्षेत्र, (अमित )21 जनवरी : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हरियाणा सरस्वती हैरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दर्शन लाल जैन हरियाणा सरस्वती हैरिटेज डेवलेपमेंट बोर्ड, पंचकुला व कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दर्शन लाल जैन सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर रिसर्च ऑन सरस्वती रिवर केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के दूसरे दिन तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि सरस्वती नदी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का केन्द्र रहा है। उन्होंने कहा कि सरस्वती नदी 2.5 करोड़ वर्ष पुरानी है जो प्राचीन भारतीय संस्कृति, इतिहास एवं आध्यात्मिकता को रेखांकित करती है। इसलिए हमें अपनी प्राचीन संस्कृति एवं विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता है। वहीं पहले सत्र में केन्द्र के निदेशक एवं केयू छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. आर चौधरी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि सरस्वती नदी अखण्ड भारत का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि पदमश्री दर्शन लाल जैन के मार्गदर्शन में हरियाणा में सरस्वती नदी के जीर्णोद्धार का कार्य निरंतर प्रगति पर है। इस मौके पर हरियाणा सरस्वती हैरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड के सीईओ कुमार सुप्रविन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प सरस्वती के धरातल पर अविरल बहने और जीर्णोद्धार के लिए सरस्वती हैरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड ने सराहनीय कार्य किया है। वहीं डॉ. पीएस ठक्कर, इसरो के पूर्व वैज्ञानिक, गुजरात ने ऑनलाइन जुड़कर पीपीटी के माध्यम से बताया कि साहित्यिक एवं शोध के अनुसार वैदिक सरस्वती नदी माउंट मैरू से हाकर गुजरात के कच्छ तक आती थी और वहीं राजस्थान में ये विलुप्त हो जाती थी। उन्होंने सैटेलाइट के रिमोट सैंसिंग सैटेलाइट से संबंधित एरियल चित्र से रण के कच्छ, मोहन जोदड़ों, हड़प्पा संस्कृति, लुम्बिनी, नालंदा, कलिंगा, कच्छ के पथ्थरगढ़, धौलावीरा, द्वारका सहित लोथल के पुरातत्व स्थलों का विश्लेषण करके पुरातत्व स्थलों की ऐतिहासिकता को प्रदर्शित किया। उन्होंने कहा कि मेरोपंत पिंगले व डॉ. वीएस वाकांकर ने दर्शन लाल जैन की अगुवाई सरस्वती के उद्गम स्थलों को लेकर आदिबद्री से लेकर राजस्थान एवं गुजरात की यात्रा की थी। डॉ. एनपी सिंह, पूर्व चीफ जनरल मैनेजर, ओएनजीसी ने कहा कि सरस्वती नदी हिमालय से निकलकर 1500 किलोमीटर की यात्रा में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान सहित गुजरात के रण ऑफ कच्छ में जाती है। वहीं रामायण और महाभारत में भी इसका वर्णन मिलता है। ओएनजीसी सरस्वती परियोजना के अंतर्गत 2006 में जैसलमेर में पानी के बोरवेल को खोदा गया जहां पानी की उपलब्धता मिली वहीं आज भी इस पानी का प्रयोग वहां के लोग कर रहे हैं। 2014 में सरस्वती नदी शोध संस्थान एनजीओ ने ओएनजीसी को गर्मी के मौसम में पानी की कमी से अवगत करवाया। उन्होंने बताया कि सरस्वती के 10 कुंए के बारे में जानकारी दी कि यमुनानगर में 5, कुरुक्षेत्र में 2, कैथल, फरीदाबाद व सिरसा में एक-एक है। देबप्रिय बिस्वल, स्ट्रक्चरल डिजाइन कंसलटेंट ने पीपीटी के माध्यम से कहा कि भारतीय परंपरा में गांव, अंचल, प्रदेश, देश-राष्ट्र तक का सीमांकन जल-निर्गम के आधार और विस्तार से होता था। उन्होंने कहा कि समुद्र की भीतर एक ब्रह्मांड है जिसमें जीव-जंतु के लिए जीवन है। इसलिए जल धर्म की मर्यादा सुनिश्चित है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में रामायण संदर्भ में भगवान राम ने समुद्र के पानी को बिना बाधा पहुचाएं अपने कार्य की सिद्धि की थी वैसी ही वर्तमान में भी हमें नदियों के संरक्षण के लिए कार्य करना होगा। वहीं उसके साथ ही उन्होंने नदियों के जल संरक्षण हेतु हाईड्रोलोजिकल मॉडल को अपनाने की भी बात कही। अंतरराष्ट्रीय विद्वान अलेह पेरज़ाशकेविच ने ऑनलाइन जुड़ते हुए कहा कि भारतीय इतिहास एवं संस्कृति पूरे विश्व में प्रचलित है। उन्होंने कहा कि दक्षिण तुर्कमेनिस्तान (वर्तमान तुर्कमेनिस्तान) में मिली मुहरों का आकार हड़प्पा, मोहनजोदड़ों और दूसरी जगहों पर मिली मुहरों पर मिली चित्रलिपि का सीधा संबंध भारतीय चित्रों से है। उन्होंने कहा कि मुहरों के अलावा, तुर्कमेनिस्तान में भारतीय हड्डी के मोती, हाथीदांत के और गाय-बैल की तस्वीरें मिली हैं, जो प्री-हड़प्पा बनावली, और कोट-डिजी और कालीबंगन में मिली तस्वीरों जैसी हैं।
यूएसए से आए जिजिथ रवि ने कहा कि सरस्वती से गंगा का प्रवास विषय पर प्रस्तुति देते हुए कहा कि पुराणों में गंगा सरस्वती सभ्यता को अपनाने वाली नदी है। पारिस्थितिक बदलाव के कारण भारतीय सभ्यता सरस्वती से गंगा की ओर पूरब की ओर फैली। वहीं जब सरस्वती नदी सूख गई, तो सभ्यता गंगा नदी की ओर चली गई। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद में (3300-3000 बीसीइ) में सरस्वती एक बहुत बड़ी नदी थी वहीं 2200-2000 बीसीइ में सरस्वती से गंगा में बदलाव का वर्णन मिलता है।
इस अवसर पर कांफ्रेंस में डॉ. एस कल्याण रमन, रविकांत व प्रो. मनमोहन शर्मा, डॉ. तेजस, ने भी अपना उद्बोधन दिया। इस मौके पर शिक्षक, प्रतिभागी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।




