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उर्स के मौके पर दरगाह प्रमुख व सज्जादानशीन का जायरीन के नाम अहम पैग़ाम

पवन कालरा संवाददाता राष्ट्रीय सभ्यता

बरेली : उर्स-ए-रज़वी में दुनिया भर से आने वाले जायरीन के नाम अपना पैगाम देते हुए दरगाह प्रमुख हज़रत मौलाना सुब्हान रज़ा खान(सुब्हानी मियां) व सज्जादानशीन बदरूशरिया मुफ्ती अहसन रज़ा क़ादरी(अहसन मियां) ने कहा कि दुनिया ने अपने दामन में अच्छी और बुरी दो सिफत रखने वाली शख्सियात को समेट कर पनाह दी है। लेकिन कुछ शख्सियात का पैकर-ए-अहसास इतना शानदार होता है कि जिन्हें तारीख(इतिहास) में सुरक्षित रखने के प्रयास किए जाए या नहीं,वह खुद इतिहास रच देते है। इमाम अहमद रज़ा फाजिले बरेलवी ने हर विषय पर इतना गहरा इल्म हासिल किया,इससे सब हैरान है। जिसने कुरान की बातों को माना और उस पर अमल किया उसने मुख़्तसिर ज़िंदगी में सदियों की कमाई हासिल कर ली। मेरे इमाम पर ये अता..ये नवाज़िश.. ये इनायत.. ये करम.. ये फैज़ सब कुछ महज़ इश्क़-ए-रसूल की बुनियाद पर हासिल था। हमारे दादा जान आला हज़रत ने अपने इल्मी और दीनी सलाहियतों से मुसलमानों में जो ज़हनी इंकलाब पैदा किया,उसकी शहादत इसकी पूरी सदी दे रही है। इस 107 उर्स-ए-रज़वी के मुबारक मौके पर देश विदेश से आने वाले तमाम मुरीदीन को दरगाह का पैगाम यही है कि सभी लोग दीन-ए-इस्लाम पर सख्ती से कायम रहते हुए अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम ले। खानकाही इत्तेहाद पर जोर देते हुए कहा कि सभी सिलसिले के बुजुर्गों ने हमें आपस में मिलजुल रहने की सीख दी है। साथ ही मसलक-ए-अहले सुन्नत और मुल्क की तरक्की और खुशहाली के लिए काम करे। इस्लाम और आला हज़रत का पैगाम मुहब्बत है उसे आम करें। सामाजिक बुराइयों से अपने आप को महफूज़ रखते हुए सोशल मीडिया का इस्तेमाल खासकर आज का युवा बहुत सावधानी के साथ करे। अपने मज़हब और अपने वतन के सच्चे वफादार रहकर लोगों के लिए भलाई का काम करें। यही आला हज़रत के लिए सच्चा ख़िराज़ होगा।

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