धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पौराणिक अष्टकोसी परिक्रमा 18 मार्च को होगी

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक ब्यूरो चीफ – संजीव कुमारी।
केडीबी, सरस्वती बोर्ड और धार्मिक, सामाजिक संगठन की रहेगी बड़ी भूमिका।
परिक्रमा को लेकर केडीबी कार्यालय में बैठक, पहली बार बनेगी परिक्रमा के लिए आयोजन समिति।
कुरुक्षेत्र, 14 फरवरी : धर्मनगरी कुरुक्षेत्र की प्राचीन धार्मिक पदयात्रा अष्टकोसी परिक्रमा 18 मार्च को श्रद्धा और परंपरा के साथ आयोजित की जाएगी। परिक्रमा की तैयारियों और व्यवस्थाओं को लेकर शनिवार को ब्रह्मसरोवर स्थित कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड (केडीबी) कार्यालय में केडीबी, हरियाणा सरस्वती हैरिटेज बोर्ड और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं की संयुक्त बैठक आयोजित हुई। बैठक में पहली बार अष्टकोसी परिक्रमा के व्यवस्थित आयोजन के लिए एक औपचारिक आयोजन समिति के गठन का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया।
बैठक में केडीबी के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल, सरस्वती बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन धुमन सिंह किरमिच, नाभि कमल मंदिर के महंत विशाल मणि सहित केडीबी के सदस्य अशोक रोशा, राजेश शांडिल्य, हरमेश सैनी, अलकेश मोदगिल और रोशन बेदी उपस्थित रहे। सभी ने परिक्रमा को भव्य, सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से संपन्न कराने पर जोर दिया। चैत्र मास की कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च 2026 को अष्टकोसी परिक्रमा नाभि कमल मंदिर में पूजा के बाद प्रात: सवा पांच बजे गंतव्य की ओर बढ़ेगी। परिक्रमा में भागीदारी करने वाले श्रद्धालु साढ़े चार बजे नाभिकमल मंदिर पर आमंत्रित किये जाएंगे। प्रसाद वितरण, भजन-कीर्तन और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा स्वागत व्यवस्था सुनिश्चित करने पर विस्तृत चर्चा हुई। अधिकारियों ने कहा कि बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इस बार व्यवस्थाओं को अधिक सुदृढ़ किया जाएगा, ताकि तीर्थयात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
केडीबी के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल ने बताया कि कुरुक्षेत्र की अष्टकोसी परिक्रमा का धार्मिक और पौराणिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि धर्मराज युधिष्ठिर ने इस परिक्रमा की परंपरा की शुरुआत की थी। यह परिक्रमा 48 कोस की व्यापक परिक्रमा का एक अहम हिस्सा है और सदियों से सनातन तीर्थ परंपरा की अटूट कड़ी के रूप में विख्यात रही है। जानकारों के अनुसार ब्रिटिश काल में भी इस परिक्रमा को लेकर प्रशासनिक स्तर पर व्यवस्था और दिशा-निर्देश जारी किए जाते थे।
सरस्वती बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन धुमन सिंह ने बताया कि बोर्ड द्वारा सरस्वती किनारे परिक्रमा पथ को सुगम बनाने के लिए विशेष प्रयास जारी हैं। यह परिक्रमा नाभि कमल मंदिर से आरंभ होकर सोम तीर्थ, सरस्वती घाट, स्थाण्वीश्वर महादेव मंदिर, कुबेर मंदिर, दधीचि तीर्थ, बाणगंगा, भीष्म कुंड नरकातारी सहित अनेक प्रमुख तीर्थों से होकर पुन: नाभि कमल मंदिर पर संपन्न होगी। धार्मिक मान्यता है कि इन पवित्र स्थलों की परिक्रमा करने से पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अष्टकोसी परिक्रमा आस्था, संस्कृति और तीर्थ परंपरा का प्रमुख केंद्र मानी जाती है।
बैठक में इन विषयों पर रहा फोकस
पहली बार आधिकारिक आयोजन समिति गठन होगी और परिक्रमा का लोगो तैयार होगा। सुरक्षा, चिकित्सा, सूचना पट्ट, प्रसाद वितरण व स्वागत प्रबंधों पर मंथन किया गया। प्रचार-प्रसार और भजन मंडलियों की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया। धार्मिक संस्थाओं और संगठनों की सक्रिय भूमिका तय की जाएगी। परिक्रमा मार्ग पर सूचना पट्ट लगेंगे। श्रद्धालुओं के लिए सुगम पथ एवं सुरक्षा की व्यवस्था की जाएगी। परिक्रमा के साथ एंबुलेंस और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध रहेगी।
बोर्ड और धार्मिक संगठनों का उद्देश्य
परिक्रमा की परंपरा महाभारत काल से जुड़ी मानी जाती है। 48 कोस परिक्रमा का महत्वपूर्ण धार्मिक अंग है। वर्ष 2025 से पुनरुद्धार प्रयासों से पहचान और आस्था बढ़ी है। युवा पीढ़ी को पौराणिक धरोहर से जोड़ा जाएगा।




