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सनातन धर्म के आदि प्रवर्तक भगवान शिव है : समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया

कुरुक्षेत्र पिपली, (प्रमोद कौशिक/उमेश गर्ग) 16 फरवरी : श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली, कुरुक्षेत्र के पीठाधीश और समर्थगुरु धारा हिमाचल के ज़ोनल कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि सिद्ध योगी अंतरराष्ट्रीय संत यज्ञ सम्राट महामंडलेश्वर स्वामी श्री कालीदास जी महाराज के काल सिद्ध पीठ श्री शिव शक्ति बाबा कालीदास धाम सांपला आश्रम हरियाणा में 11 दिवसीय अखंड महायज्ञ की पावन वेला में समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी शामिल हुए। इस अवसर पर बाबा कालिदास ने समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया के लिए विशेष हवन किया एवं उनका सम्मान भी किया।
भारतीय जनता पार्टी, हरियाणा के अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली के साथ समर्थगुरु जी की सनातन धर्म के सशक्तिकरण, तनावमुक्त पढ़ाई के लिए शिक्षण संस्थानों में ध्यान कार्यक्रम और अन्य बातों पर विशेष चर्चा की गई। सनातन धर्म में आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता का समावेश है। समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया के द्वारा महाशिवरात्रि को समर्थगुरु धाम, मुरथल, हरियाणा के समर्थगुरु निवास में अपर घाघरी झरने का उद्घाटन संपन्न हुआ। समर्थगुरु धाम के झेन कुंज में पहले से ही लोअर घाघरी झरना मौजूद है।
नेतरहाट आवासीय विद्यालय में समर्थगुरु ने 1955-61 में विद्याध्ययन किया था। नेतरहाट, झारखंड में ये दोनों झरने प्राकृतिक रूप में मौजूद हैं। उसी की स्मृति में समर्थगुरु धाम में इन दोनों झरनों का निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार सरदार गुरुदेव सिंह द्वारा किया गया है।
समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया जी ने बताया कि सनातन धर्म के आदि प्रवर्तक,पहले प्रवर्तक भगवान शिव हैं। उन्हीं से योग,तंत्र, ध्यान, अध्यात्म शुरू होता है। उन्हीं से गुरु शिष्य परंपरा शुरू होती है। हम अहोभाव व्यक्त करते हैं उस आदि गुरु का जिसके कारण गुरु शिष्य परंपरा जन्मी,
फली-फूली,आगे बढ़ी और आज भी बढ़ रही है। महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया द्वारा विशेष ऑनलाइन शिव दरबार भी आयोजित किया गया। जिसमें देश विदेशों से 333 प्रतिभागियों ने अपने परिवार सहित आरती हीलिंग के माध्यम से भगवान शिव की दिव्य ऊर्जा, शक्तिपात और औरा क्लीनिंग का अनुभव किया गया। जब तक पूरा गुरु नहीं मिलता है, तब तक अनुभव ज्ञान नहीं होता है। और जब तक अनुभव ज्ञान नहीं होता है, तब तक आत्मज्ञान नहीं होता है, तब तक मुक्ति नहीं होती है। शिष्यत्व से बड़ा सौभाग्य न कभी था, न आज है कहीं और न कहीं और होगा।

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