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साधना का केंद्र आत्मज्ञान है : समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया

साधना का केंद्र आत्मज्ञान है : समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया

ब्यूरो चीफ – संजीव कुमारी

कुरुक्षेत्र,7 जनवरी : श्री दुर्गा देवी मन्दिर पिपली कुरुक्षेत्र के पीठाधीश और समर्थगुरु संघ हिमाचल के जोनल कॉर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि अपने ईष्ट देव और सदगुरु की आरती करने और भोग लगाने से परिवार में प्रेम, श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मकता ऊर्जा आती हैं। वातावरण शुद्ध होता है। नज़र दोष से बचाव होता है। सनातन धर्म में सदगुरु, भगवान, आरती, ध्यान और सुमिरन का बहुत महत्त्व है। सनातन धर्म में हम सभी को अपनी कमाई और समय का दसवां हिस्सा परोपकार के लिए जरूर ही निकालना चाहिए।
मानव जीवन ही अपने पुराने जन्मों के पाप कर्मों को खत्म कर सकता है और पुण्य कर्म कर सकता है। जीव जंतुओं में बुद्धि और विवेक ही नहीं होता जिससे वो पुण्य कर्म करें। मानव जन्म भगवान और संतों की कृपा से ही मिलता है। 84 लाख योनियां में मानव जन्म दुर्लभ है। भगवान की कृपा से ही पूर्ण सदगुरु समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी मिलते है। औलिया अर्थात जो ब्रह्मनिष्ठ है। 6 जनवरी को रात्रि में औलिया दिवस के उपलक्ष्य में विशेष सूफी दरबार ऑफ लाइन और ऑनलाइन हुआ जिसमें देश विदेशों से
औलिया दिवस के अवसर पर आयोजित सूफ़ी दरबार में 325+ सहभागियों ने समर्थगुरु द्वारा शक्तिपात का मज़ा लिया। सूफ़ी संतों और भगवान की दिव्य कृपा को अनुभव किया।
ट्विटर के माध्यम से समर्थगुरु धाम संस्थान के संस्थापक आदरणीय समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी ने बताया कि साधना का केंद्र आत्मज्ञान है। स्वयं को आत्मा जानना और आत्मा के रूप में जीना, साक्षी होकर, तथाता होकर जीना, आत्मज्ञान में जीना। समर्थगुरु के श्रद्धेय एवं अग्रज तुल्य महायोगी पायलट बाबा की शिष्या महामंडलेश्वर माँ चेतना और माँ श्रद्धा ने समर्थगुरु से समर्थगुरु धाम,मुरथल में भेंट की। समर्थगुरु धारा के मिशन संगम के अंतर्गत सनातन धर्म के सशक्तिकरण में सक्रिय रूप से भाग लेने वे संकल्पित हैं।

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