लुवास में पशुचिकित्सकों के लिए 10 दिवसीय अल्ट्रासाउंड प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ

लुवास में पशुचिकित्सकों के लिए 10 दिवसीय अल्ट्रासाउंड प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ
हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक दूरभाष – 94161 91877
हिसार,6 मार्च : लाला लाजपत राय पशुचिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास), हिसार में हरियाणा पशुपालन एवं डेयरी विभाग में कार्यरत पशुचिकित्सकों के लिए “पशुचिकित्सा में अल्ट्रासाउंड के उपयोग” विषय पर 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम विश्वविद्यालय के पशुचिकित्सा महाविद्यालय के सर्जरी विभाग एवं पशुचिकित्सा नैदानिकी विभाग द्वारा हरियाणा पशुचिकित्सा प्रशिक्षण संस्थान के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. (डॉ.) विनोद कुमार वर्मा रहे । उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ करते हुए अल्ट्रासाउंड तकनीक की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम विश्वविद्यालय के “लैब टू लैंड” दृष्टिकोण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने पशुचिकित्सकों को पशुपालन व्यवस्था की रीढ़ बताते हुए कहा कि आधुनिक तकनीकों के माध्यम से पशुओं के रोगों का त्वरित एवं सटीक निदान संभव हो रहा है। उन्होंने प्रतिभागी पशुचिकित्सकों से आह्वान किया कि वे इस प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान और तकनीक को किसानों एवं पशुपालकों तक पहुंचाएं, ताकि पशुपालन को और अधिक लाभकारी बनाया जा सके।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में हरियाणा पशुपालन एवं डेयरी विभाग के 12 पशु-चिकित्सक भाग ले रहे हैं, जो राज्य के विभिन्न पशु चिकित्सालयों एवं पॉलीक्लिनिकों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य पशुचिकित्सकों को आधुनिक अल्ट्रासोनोग्राफी तकनीक से परिचित कराना तथा उन्हें पशुओं में विभिन्न रोगों के निदान और उपचार के लिए व्यावहारिक कौशल प्रदान करना है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के निदेशक एवं सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आर. एन. चौधरी ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को दुधारू पशुओं में गर्भधारण, प्रजनन प्रणाली तथा उत्पादन से संबंधित विभिन्न शारीरिक तंत्रों का अध्ययन कराया जाएगा। इसके अलावा छोटे पालतू पशुओं के उदर में स्थित विभिन्न अंगों के रोगों की पहचान के लिए आधुनिक अल्ट्रासाउंड तकनीक का प्रयोग सिखाया जाएगा। उन्होंने बताया कि अल्ट्रासोनोग्राफी तकनीक पशुओं में गर्भावस्था की जांच, बांझपन के कारणों की पहचान तथा आंतरिक अंगों में होने वाले रोगों के निदान में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस तकनीक के माध्यम से पशुओं की पेशाब की थैली, मूत्रनलिका, जिगर, तिल्ली, आंतों, किडनी तथा मांसपेशियों से संबंधित बीमारियों का सटीक निदान किया जा सकता है। इसके साथ ही प्रतिभागियों को कुत्तों एवं बिल्लियों में हृदय की अल्ट्रासोनोग्राफी (इकोकार्डियोग्राफी) से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस तकनीक का उपयोग करते समय भ्रूण लिंग जांच निषेध नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. तरुण गुप्ता ने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को विश्वविद्यालय के चिकित्सालय में आने वाले पशुओं तथा प्रायोगिक पशुओं पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिससे उन्हें अल्ट्रासोनोग्राफी तकनीक का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होगा और वे इस तकनीक का प्रभावी उपयोग कर सकेंगे।
कार्यक्रम के अंत में पशुचिकित्सा नैदानिकी विभाग के प्रमुख डॉ. ज्ञान सिंह ने सभी गणमान्य अतिथियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए सभी के सहयोग की सराहना की। इस अवसर पर विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. गौतम, कुलसचिव डॉ. एस. एस. ढाका, मानव संसाधन एवं प्रबंधन निदेशक डॉ. सोनिया सिन्धु, छात्र कल्याण निदेशक डॉ. संदीप गुप्ता, पैरा वेटरनरी साइंस निदेशक डॉ. पवन कुमार सहित विश्वविद्यालय के सभी विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक उपस्थित रहे।
जनसंपर्क अधिकारी डॉ. निलेश सिंधु ने बताया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम विश्वविद्यालय और पशुपालन विभाग के बीच तकनीकी सहयोग को मजबूत करते हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकों से लैस पशुचिकित्सक पशुपालकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर सकते हैं, जिससे पशुपालन क्षेत्र की उत्पादकता और आय में वृद्धि होगी।



