होली में अपनी बुराईयों की आहुति करें और अच्छे गुणों को जीवन में लाये : डॉ. मिश्रा

वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।

कुरुक्षेत्र : हार्मनी ऑकल्ट वास्तु जोन के अध्यक्ष व श्री दुर्गा देवी मन्दिर पिपली (कुरुक्षेत्र) के पीठाधीश ज्योतिष व वास्तु विशेषज्ञ डॉ. मिश्रा ने बताया होली का त्यौहार इस बार शुक्रवार 14 मार्च 2025 को मनाया जाएगा। इससे पहले गुरुवार 13 मार्च 2025 को होलिका दहन है। होली की तैयारी हर घर में शुरू हो गई है। घरों के साथ-साथ बाजार भी सजने लगे हैं। होली के दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर गले मिलते हैं और पुराने गिले-शिकवों को दूर करते हैं। होलिका की पवित्र आग में लोग जौ की बाल और शरीर पर लगाए गए सरसों के उबटन को डालते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये करने से आपके घर में खुशी और शान्ति आती है।
होलिका पूजन की सामग्री :
गोबर से बनी होलिका और प्रहलाद की प्रतिमाएं, माला, रोली, फूल, कच्चा सूत, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, पांच या सात प्रकार के अनाज जैसे नए गेहूं और अन्य फसलों की बालियां, एक लोटा जल, बड़ी-फुलौरी, मीठे पकवान, मिठाइयां और फल।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त :
डॉ .मिश्रा ने बताया कि पंचांग दिवाकर के अनुसार 13 मार्च 2025 भद्रामुखकाल रात्रि 8 बजकर 18 मिनट से 10 बजकर 27 मिनट तक रहेगा तथा भद्रा पुच्छकाल रात्रि 7 बजे से 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। अतएव आवश्यक परिस्थितिवश भद्रामुखकाल को त्याग कर भद्रा पुच्छकाल में होलिका दहन किया जा सकता है।
परन्तु शास्त्र निर्देश अनुसार भद्रा बाद रात्रि 11 बजकर 31 मिनट के बाद तथा निशीथ काल से पहले रात्रि 12 बजकर 37 मिनट तक ही होलिका दहन करना चाहिए ।
होलिका दहन पूजा-विधि :
डॉ. मिश्रा ने बताया होलिका दहन से पूर्व होली का पूजन करने का विधान है। इस समय जातक को पूजा करते वक्त पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए। पूजन करने के लिए माला, रोली, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल, पांच प्रकार के अनाज में गेहूं की बालियां और साथ में एक लोटा जल रखना चाहिए और उसके बाद होलिका के चारों ओर परिक्रमा करनी चाहिए।
होली का पौराणिक महत्त्व : होलिका से जुड़ी कथा के अनुसार कहा जाता है कि होलाष्टक के दिन से भक्त प्रह्लाद को कारागार में बंद कर दिया गया था और होलिका में जलाने की तैयारी की गई थी। वहीं दूसरी कहानी के अनुसार कहा जाता है कि भगवान शिव ने होलाष्टक के दिन में कामदेव को भस्म किया था।
होली का आध्यात्मिक महत्त्व : होलिका दहन के आध्यात्मिक अर्थ में हम अपनी बुराईयों को ध्यानयोग अग्नि में आहुति दे । अपनी आत्मा को अच्छे गुणों से विकसित कर परमात्म पथ पर चले। होली का अर्थ है जो बात आज अच्छी या बुरी हुई उसको भूलने के बाद वर्तमान में जीओं। संकल्प ले कर एक दूसरे की निंदा चुगली करना और बुराइयों को बंद करें। सभी के गुणों को देखें क्योंकि भगवान् हम सभी का रचयिता है तो उसकी रचना सारा विश्व है इसलिए सभी से प्रेम करने का रंग लगाये क्योंकि प्रेम ही भगवान है और भगवान ही प्रेम है।

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