महिला सुरक्षा और समानता विकसित समाज की आधारशिला : प्रो. सोमनाथ सचदेवा

महिलाओं की सुरक्षा और जागरूकता से ही होगा देश का समग्र विकासः प्रो. सुदेशः प्रो. सुदेश।
महिलाओं के लिए सुरक्षित व समावेशी परिसर समय की आवश्यकताः प्रो. शुभांगी वैद्य।
कुवि में महिलाओं के लिए समावेशी परिसर विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला।
कुरुक्षेत्र, (प्रमोद कौशिक) 11 मार्च : महिलाओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और समान अवसरों वाला वातावरण समाज और राष्ट्र के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्राचीन भारतीय समाज में नारी को उच्च स्थान प्राप्त था। उस समय महिलाओं को स्वयंवर का अधिकार था और उन्हें देवी के रूप में सम्मान दिया जाता था। नारी को शक्ति का प्रतीक माना गया है धन की देवी के रूप में लक्ष्मी, विद्या की देवी के रूप में सरस्वती और शक्ति के रूप में दुर्गा माता की पूजा की जाती रही है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में नारी को बहुत ऊँचा दर्जा दिया गया है।यह विचार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) द्वारा विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में “फॉस्टरिंग इनक्लूसिव कैंपसेस फॉर वीमेनः रोल ऑफ आईसीसी” विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। उद्घाटन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। कार्यशाला में आईसीसी की अध्यक्षा प्रो. सुनीता सिरोहा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया व कार्यक्रम की रूपरेखा व आईसीसी के कार्यों के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि हालांकि आज के समय में समाज काफी हद तक पुरुष प्रधान बन गया है, जो एक गंभीर और चिंताजनक विषय है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपनी सकारात्मक परंपराओं और मूल्यों को याद करते हुए महिलाओं को समान सम्मान और अधिकार प्रदान करें। उन्होंने कहा कि आज महिलाएं खेती से लेकर विज्ञान तक लगभग हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रही हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में भी लगभग 99 प्रतिशत गोल्ड मेडलिस्ट में छात्राएं आगे हैं। चाहे इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी, लाइफ साइंस या अन्य विज्ञान के क्षेत्र हों हर जगह छात्राएं अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। अब एनसीसी जैसे अनुशासन और नेतृत्व के क्षेत्रों में भी लड़कियाँ बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं और अपनी क्षमता का शानदार प्रदर्शन कर रही हैं। कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि इक्वैलिटी, इक्विटी, इक्विटेबल और इंक्लूसिविटी जैसे मूल सिद्धांतों को अपनाकर समाज में महिलाओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और समान अवसरों वाला वातावरण बनाया जा सकता है। जब महिलाओं को समान अधिकार, उचित अवसर और हर क्षेत्र में भागीदारी मिलती है, तो समाज की सोच सकारात्मक बनती है और सामाजिक व्यवस्था भी मजबूत होती है। इससे न केवल महिलाओं का सशक्तिकरण होता है बल्कि राष्ट्र की प्रगति को भी नई दिशा मिलती है। उन्होंने कहा किनारी की सुरक्षा के लिए सुरक्षित माहौल, समाज की सकारात्मक सोच और मजबूत व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है। इन मूल्यों के आधार पर ही राष्ट्र कल्याण को बढ़ावा देते हुए विकसित भारत की मजबूत और स्थायी नींव रखी जा सकती है।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय, खानपुर कलां (सोनीपत) की कुलगुरु प्रो. सुदेश ने अपने संबोधन में कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समाज में महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण और समानता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। जब तक महिलाओं को शिक्षा, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक देश का समग्र विकास संभव नहीं है। प्रो. सुदेश ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा केवल कानूनों से ही नहीं बल्कि समाज की सकारात्मक सोच, जागरूकता और सामूहिक प्रयासों से सुनिश्चित की जा सकती है। शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। इसके साथ ही महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी बेहद जरूरी है ताकि वे किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा सकें। उन्होंने कहा कि आईसीसी जैसे मंच महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मुख्य वक्ता के रूप में इग्नू, नई दिल्ली की प्रो. शुभांगी वैद्य ने महिलाओं के लिए सुरक्षित एवं समावेशी परिसर की आवश्यकता पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि लैंगिक समानता और न्याय सिर्फ महिलाओं के हित के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के विकास के लिए आवश्यक है। यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे हासिल किए बिना अन्य विकास लक्ष्यों को पाना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता के कई संकेतक हैं, जिनमें अच्छा पोषण, स्वास्थ्य सुविधाएं, प्रजनन अधिकार, शिक्षा, कार्यबल में भागीदारी, राजनीतिक समानता, कानूनी और संपत्ति के अधिकार, और हिंसा व शोषण से मुक्ति शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असमानताओं को दूर करना बेहद जरूरी है।
उद्घाटन सत्र के बाद आयोजित पहले सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ सेंटर-1 की प्रो. अनु मेहरा ने संसाधन व्यक्ति के रूप में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम से जुड़े कानूनों और प्रक्रियाओं पर व्याख्यान दिया। इस सत्र की अध्यक्षता दयाल सिंह कॉलेज, करनाल की प्राचार्य प्रो. आशिमा गक्खर ने की।
दोपहर बाद आयोजित दूसरे सत्र में कुवि की सीडीओई निदेशक प्रो. मंजुला चौधरी ने महिलाओं के लिए समावेशी शैक्षणिक वातावरण को मजबूत करने के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। इस सत्र की अध्यक्षता विधि विभाग की प्रो. प्रीति जैन ने की।
कार्यक्रम के अंत में संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने कार्यशाला से संबंधित अपने विचार और सुझाव साझा किए। इस सत्र में सीडीओई की निदेशक प्रो. मंजुला चौधरी, आईसीसी की अध्यक्षा प्रो. सुनीता सिरोहा, विधि विभाग की प्रो. प्रीति जैन, सामाजिक कार्य विभाग की प्रो. वनिता ढींगरा, दयाल सिंह कॉलेज करनाल की प्राचार्य प्रो. आशिमा गक्खर तथा परीक्षा नियंत्रक डॉ. अंकेश्वर प्रकाश मंच पर उपस्थित रहे। मंच का संचालन प्रो. वनिता ढींगरा ने किया व डॉ. अनिल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों से कार्यशाला के संबंध में फीडबैक भी लिया गया। इस अवसर पर प्रो. प्रीति जैन, प्रो. आशिमा गक्खर, प्रो. शुचिस्मिता, प्रो. निर्मला चौधरी, डॉ. अंकेश्वर प्रकाश, प्रो. अनिता भटनागर, डॉ. वंदना दवे सहित विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्यों, शिक्षकों, व विद्यार्थियों ने भाग लिया।



