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सनातन वैदिक नव संवत्सर किसी, जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं अपितु यह मानव मात्र का नववर्ष है : सतीश कौशिक

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।
ब्यूरो चीफ – संजीव कुमारी दूरभाष – 94161 91877

सनातन वैदिक नववर्ष केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्म सुधार का अवसर भी है।
ब्रह्मसरोवर के पावन परिसर में सनातन वैदिक नववर्ष, चैत्र नवरात्रि एवं विक्रमी नव संवत्सर – 2083 के शुभारंभ एवं अभिनंदन के उपलक्ष्य में मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा कार्यक्रम संपन्न।
चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन से ही विक्रम संवत का भी आरंभ होता है, जो भारत की प्राचीन और प्रतिष्ठित काल गणना प्रणाली है।
विक्रमी संवत 2083 के शुभारंभ पर मातृभूमि शिक्षा मंदिर एवं कुरुक्षेत्र संस्कृत वेद विद्यालय के ब्रह्मचारियों ने ब्रह्मसरोवर के पर संयुक्त रूप से सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं पोषण का संकल्प लिया।

कुरुक्षेत्र 19 मार्च : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैदिक पंचांग के अनुसार नव वर्ष का प्रथम दिवस है। यह दिन केवल कैलेंडर परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और चेतना के नव जागरण का प्रतीक है। यही दिवस विक्रम संवत का शुभारंभ करता है, जिसकी स्थापना सम्राट विक्रमादित्य ने की थी। भारतीय संस्कृति में यह दिन नई ऊर्जा, नवसृजन और सकारात्मक शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह विचार सनातन वैदिक नववर्ष, चैत्र नवरात्रि एवं विक्रमी नव संवत्सर – 2083 के शुभारंभ एवं अभिनंदन के उपलक्ष्य में ब्रह्मसरोवर के पावन परिसर में मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ सूर्योदय पर सूर्य की प्रथम किरण के अभिषेक से वैदिक ब्रह्मचर्य द्वारा स्वस्तिवाचन, शंख ध्वनि से सनातन वैदिक नववर्ष के अभिनंदन एवं लोक मंगल की प्रार्थना से हुआ। मातृभूमि शिक्षा मंदिर एवं कुरुक्षेत्र संस्कृत वेद विद्यालय के ब्रह्मचारियों ने संयुक्त रूप से वैदिक मंत्रोच्चारण एवं दिव्य शंख ध्वनि से ब्रह्मसरोवर के परिसर को गुंजायमान कर दिया।
सनातन वैदिक नव संवत्सर अभिनंदन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा भारतीय परंपरा में इस दिन को नए सृजन, नई ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में यह दिन अलग अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन इसके मूल में प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। सनातन वैदिक नव संवत्सर किसी, जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं है, अपितु यह मानव मात्र का नववर्ष है। यह विशुद्ध रूप से भौगोलिक पर्व है। सनातन वैदिक नव वर्ष को भारतीय संस्कृति में अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना का आरंभ हुआ था। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि का निर्माण प्रारंभ किया था। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्म सुधार का अवसर भी है।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा चैत्र नवरात्रि को शक्ति की उपासना का पर्व मनाया जाता है। यह हिंदू नव वर्ष और चैत्र नवरात्रि का पर्व यह संदेश देता है कि जीवन में हर नया दिन एक नई शुरुआत का अवसर लेकर आता है। नए वर्ष के साथ लोग अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने और नए संकल्प लेने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। इसी तिथि से विक्रम संवत का भी आरंभ होता है, जो भारत की प्राचीन और प्रतिष्ठित काल गणना प्रणाली है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आचार्य सतीश कौशिक ने कहा यह पर्व लोगों को नई शुरुआत करने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं,साथ ही परिवार और समाज को एकजुट करने का अवसर भी प्रदान करते हैं। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में इन पर्वों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता और परंपराओं की निरंतरता भी दिखाई देती है। हिंदू नव वर्ष और चैत्र नवरात्रि केवल धार्मिक पर्व नहीं हैं, बल्कि इनका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी बेहद गहरा है। इन पर्वों के माध्यम से समाज में सकारात्मकता, अनुशासन और आध्यात्मिकता का संदेश दिया जाता है।
समस्त वैदिक कार्यक्रम वेदपाठी ब्रम्हचारी अमित के द्वारा संपन्न किया गया। कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन की ओर से अतिथियों को स्मृति चिह्न एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन सुरेंद्र कुमार ने किया। कार्यक्रम में आचार्य संजय, दीपक, अभिषेक, जतिन। अमन, रोहित सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ से हुआ।

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