
हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।
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कुरुक्षेत्र, 23 जून : श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली, कुरुक्षेत्र के पीठाधीश और समर्थगुरु धारा हिमाचल के ज़ोनल कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि समर्थगुरु धाम, मुरथल, हरियाणा के संस्थापक समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी के निर्देशन में सिद्धार्थ ध्यान योग से चरैवेति तक की यात्रा के मुख्य 28 सोपान है। सभी कार्यक्रम वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता पर आधारित है।
अधिकतर सारे संसार में धर्म के नाम पर बहुत पाखंड चल रहा है।
समर्थगुरू अधिकतर प्रवचनों में सभी को यही कहते है कि मानो मत, जानो अर्थात् निजी अनुभव मुख्य है।
परमगुरु ओशो ने भी अपने मुख्य प्रवचनों में यही कहा कि साधना में जीवित सदगुरु की मुख्य भूमिका होती है।
पुरानी चीनी कहावत है कि 100 चलते हैं,
तो कोई एक पहुंचता है।
इसलिए नहीं कि यात्रा कठिन है, बल्कि इसलिए कि कोई एक ही चलना जारी रखता है। शेष मार्ग में ही कहीं अटक जाते हैं, भटक जाते हैं, कथा के शिकार हो जाते हैं, अफवाह के शिकार हो जाते हैं, कुसंग में पड़ जाते हैं, अथवा अभीप्सा की कमी के कारण राह में ही रूक जाते हैं।
उनकी स्थिति उस कुत्ते की तरह हो जाती है,
जो ‘न घर का होता है, न घाट का।’
तुम प्रतिदिन उठकर प्रार्थना करो कि हे प्रभु,
मुझे इस मार्ग पर सतत चलते रहने की प्रेरणा देते रहना, ताकि इसी जीवन में परमपद तक की यात्रा पूरी कर सकूं।
फिर गुरु अर्जुन देव जी की तरह तुम भी गा सकोगे-‘गुर परसाद परमपद पाइआ सूके कासट हरिया।’
आज ट्विटर के माध्यम से आदरणीय समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया जी ने विशेष बताया कि साक्षी और ध्यान का मूलभेद :
आंख बंद करके जब निराकार से नाता जोड़ते हो तो वह ध्यान है।
आंखे खोलकर सतत निराकार का स्मरण करते हुए संसार में अभिमुख होते हो तो यह साक्षी है।


