
मलूकपुर में 89 वर्षों से संजोई 1937 के हरम शरीफ के नक्शे की ज़ियारत, उमड़े अकीदतमंद
दीपक शर्मा (जिला संवाददाता )
बरेली : मोहर्रम की नवीं रात को शहर के मलूकपुर इलाके में एक ऐतिहासिक और रूहानी मंज़र देखने को मिला। पूर्व पार्षद मरहूम मोहम्मद नासिर की गली में अकीदतमंदों ने वर्ष 1937 के ‘नक्शा ए हरम शरीफ’ (काबा शरीफ) की ज़ियारत की। इस दौरान रोज़ा ए मुबारक का दीदार करने के लिए दूर-दराज से भारी तादाद में अकीदतमंद पहुंचे और सुब्हान अल्लाह व माशा अल्लाह कहकर मांगीं दुआ।
89 साल पुरानी पुश्तैनी रिवायत आज भी बरकरार
स्थानीय निवासी मोहम्मद शुऐब ने बताया कि यह उनके परिवार की एक ऐतिहासिक और पुश्तैनी रस्म है। उनके लकड़दादा हाजी अमीर उल्लाह साहब जब वर्ष 1937 में हज का मुकद्दस सफर मुकम्मल कर वापस लौटे थे, तब वे वहां से काबा शरीफ का यह ऐतिहासिक नक्शा अपने साथ लाए थे। इसके बाद उन्होंने मोहर्रम की 9 तारीख को इस नक्शे को सजाने की शुरुआत की थी।
आज इस बात को 89 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनकी नस्लें आज भी इस रिवायत को पूरी अकीदत के साथ निभा रही हैं। हर साल मोहर्रम की नवीं रात को सजाया जाने वाला यह रोज़ा ए मुबारक 1937 के उस दौर की यादों को आज भी तरोताज़ा कर देता है। ज़ियारत के दौरान अकीदतमंदों ने दिल में काबे शरीफ की मौजूदगी को महसूस किया और मुल्क व कौम की सलामती के लिए दुआएं कीं।
इस बेहद खास मौके पर बरेली हज सेवा समिति के संस्थापक एवं समाजसेवी पम्मी खां वारसी को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। नक्शा ए हरम शरीफ की ज़ियारत करने के बाद भावुक होते हुए पम्मी वारसी ने कहा:”यह बेहद मुकद्दस और ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे इस परिवार ने करीब नौ दशकों से संभाल कर रखा है। अल्लाह पाक से यही दुआ है कि वह हर मोमिन के नसीब में हज का मुकद्दस सफर लिखे।”
इनका रहा विशेष सहयोग
इस पूरी रिवायत को अदब और एहतराम के साथ मुकम्मल कराने में मोहम्मद शुऐब, अशफ़ाक़ अहमद,मोहम्मद रुशेद, मुजाहिद खां भूरा, इसरार वली ख़ाँ, मोहम्मद जावेद, मोहसिन, गुल मोहम्मद, मोहम्मद आसिफ और मोहम्मद इलमान आदि का विशेष सहयोग रहा।


