
लेखिका : अधिवक्ता सुचेता नाथ, दिल्ली उच्च न्यायालय एवं जिला न्यायालयों में प्रैक्टिसरत अधिवक्ता।
कुरुक्षेत्र,प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 11जुलाई : भारत में वाहनों की बढ़ती संख्या के साथ पार्किंग की समस्या भी निरंतर बढ़ती जा रही है। महानगरों तथा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अक्सर किसी के घर के बाहर अथवा मुख्य द्वार के सामने वाहन खड़ा कर देने से विवाद उत्पन्न हो जाता है। कई बार यह सामान्य कहासुनी गाली-गलौज, आपराधिक धमकी, मारपीट, महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार तथा वाहन में तोड़फोड़ जैसी गंभीर घटनाओं का रूप ले लेती है। ऐसी स्थिति में कानून को अपने हाथ में लेने के बजाय विधिक प्रक्रिया का पालन करना ही प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि केवल किसी के घर के सामने वाहन खड़ा कर देना प्रत्येक स्थिति में अपराध नहीं माना जाएगा। यदि वाहन सार्वजनिक मार्ग पर यातायात नियमों के अनुरूप खड़ा है और उससे किसी के आवागमन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हो रही है, तो मात्र वाहन खड़ा करना अपराध नहीं है। किन्तु यदि वाहन इस प्रकार खड़ा किया गया हो कि घर का मुख्य द्वार बंद हो जाए, आने-जाने का मार्ग अवरुद्ध हो जाए अथवा जानबूझकर किसी व्यक्ति को परेशान करने के उद्देश्य से ऐसा किया गया हो, तो संबंधित परिस्थितियों में यह कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
यदि इस प्रकार के विवाद के दौरान धक्का-मुक्की अथवा मारपीट होती है, तो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की विभिन्न धाराएँ लागू हो सकती हैं। साधारण चोट पहुँचाने पर धारा 115, गंभीर चोट पहुँचाने पर धारा 117, खतरनाक हथियार अथवा साधन से चोट पहुँचाने पर धारा 118, किसी व्यक्ति का मार्ग अवैध रूप से रोकने पर धारा 126, किसी व्यक्ति को अवैध रूप से रोककर रखने पर धारा 127, हमला अथवा आपराधिक बल का प्रयोग करने पर धारा 131, जान से मारने अथवा गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने पर धारा 351, जानबूझकर अपमान कर शांति भंग करने की स्थिति में धारा 352, महिला की लज्जा भंग करने अथवा उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने की स्थिति में धारा 74 एवं धारा 79, तथा वाहन या अन्य संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की स्थिति में धारा 324 के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। किसी मामले में कौन-सी धारा लागू होगी, यह घटना के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों तथा पुलिस जाँच पर निर्भर करता है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर अपने निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत विवादों का समाधान किसी भी परिस्थिति में कानून अपने हाथ में लेकर नहीं किया जा सकता। एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ प्रकरण सहित विभिन्न मामलों में न्यायालय ने अव्यवस्थित पार्किंग व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि सार्वजनिक मार्गों पर अनियंत्रित वाहन खड़े होने से नागरिकों के सुरक्षित एवं गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रभावित होता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि पार्किंग व्यवस्था सुनिश्चित करना राज्य तथा स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है, जबकि नागरिकों का दायित्व है कि वे विवाद की स्थिति में विधिक प्रक्रिया का पालन करें तथा हिंसा का सहारा न लें।
ऐसी परिस्थितियों में प्रत्येक नागरिक को धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए। सबसे पहले वाहन हटाने का विनम्रतापूर्वक अनुरोध करें। यदि सामने वाला व्यक्ति सहयोग नहीं करता, तो वाहन का पंजीकरण क्रमांक, घटना के छायाचित्र, वीडियो तथा सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखें। आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय पुलिस अथवा यातायात पुलिस को तत्काल सूचना दें। यदि मारपीट में चोट लगी हो, तो सरकारी अस्पताल में चिकित्सीय विधिक परीक्षण (एम.एल.सी.) अवश्य कराएँ, क्योंकि यह न्यायालय में महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाता है।
पुलिस में शिकायत करते समय घटना की तिथि, समय, स्थान, वाहन का पंजीकरण क्रमांक, आरोपी का नाम (यदि ज्ञात हो), प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का विवरण तथा उपलब्ध छायाचित्र, वीडियो और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग का स्पष्ट उल्लेख करें। यदि पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है, तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की जा सकती है तथा आवश्यक होने पर सक्षम न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि पार्किंग विवाद एक सामान्य नागरिक समस्या अवश्य है, परंतु यदि समय रहते संयम और कानून का पालन न किया जाए, तो यही विवाद गंभीर आपराधिक मुकदमे का रूप ले सकता है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने विधिक दायित्वों की भी जानकारी होनी चाहिए। कानून का उद्देश्य विवाद को बढ़ाना नहीं, बल्कि उसका न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित करना है।
लेखिका
अधिवक्ता सुचेता नाथ (बी.बी.ए.,एल.एल.बी.)
दिल्ली उच्च न्यायालय एवं जिला न्यायालयों में प्रैक्टिसरत अधिवक्ता
विधिक स्तंभकार
ई-मेल: suchetaadvocate@gmail.com
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य विधिक जानकारी एवं जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। प्रत्येक मामले के तथ्य एवं परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं। अतः किसी विशेष मामले में उचित विधिक सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श अवश्य लें।


