
सेंट्रल डेस्क संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।
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नई दिल्ली 17 जुलाई : भटकाव का मूल कारण प्रभु श्री बताते हैं कि इंसान के भटकने का एकमात्र कारण यह है कि वह ‘मैं’ के अतिरिक्त कुछ और जानना, देखना या समझना चाहता है। बाहरी दुनिया का ज्ञान और बौद्धिक कसरत केवल भटकाव और माया का हिस्सा हैं।
साधक को यह अभ्यास करना चाहिए कि जो कुछ भी उसे दिखाई दे, सुनाई दे या समझ में आए, वह सब ‘मैं’ ही हूँ। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि परम सत्य है। जब आप हर दृश्य और अनुभव को अपना ही विस्तार मान लेते हैं, तो द्वैत (अलग होने का भाव) समाप्त हो जाता है।
‘मैं’ से भिन्न कुछ भी जानने की कोशिश करना ही माया है। असली भक्ति यही है कि साधक ‘मैं’ (आत्मा) के अतिरिक्त किसी और चीज़ को महत्व न दे। कृष्ण का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वे सब कुछ ‘मैं’ ही हैं।
प्रभु श्री कहते हैं कि वे देरी नहीं करते, देरी साधक की इच्छाओं के कारण होती है। जब तक प्रपंच (बाहरी जगत) का बोध बना हुआ है, तब तक ‘मैं ही हूँ’ का मंत्र साधक को परम सत्य तक ले जाता है।
गोपियों की विरह अग्नि का प्रसंग देते हुए वे समझाते हैं कि जब यह बोध हो जाता है कि ईश्वर का न किसी से संयोग है और न वियोग, क्योंकि वह सबकी आत्मा है, तब मन परम रस और तृप्ति में डूब जाता है।
प्रभु अमित श्री की अनमोल वाणी यू ट्यूब चैनल “वासुदेव सर्वम” और इंस्टाग्राम में “प्रभु अमित श्री” के नाम से उपलब्ध है।
प्रभु श्री का आश्रम रायपुर छत्तीसगढ़ के गरियाबंद खरहरी क्षेत्र में स्थित है।


