Uncategorized

देश की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्रीबाई फूले की 195 वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर समाज सेवी

लोकेशन रायबरेली रिपोर्टर विपिन राजपूत

देश की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्रीबाई फूले की 195 वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर समाज सेवी

महिलाओं को अंग वस्त्र से सम्मानित किया गया। यहां पर वक्ताओं ने कहा कि 19वीं सदी में माता सावित्रीबाई फूले ने विषम परिस्थितियों में शिक्षा की अलख जगाई थी।
शनिवार 3 जनवरी को संत रैदास आश्रम सामुदायिक केंद्र रायबरेली में विभिन्न सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में देश की प्रथम महिला शिक्षिका राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फूले की 195 वीं जयंती मनाई गई। यहां इस अवसर पर राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फूले के जीवन पर आधारित एक विचार संगोष्ठी भी आयोजित की गई, जिसका संचालन विश्व दलित परिषद के अध्यक्ष राजेश कुरील ने किया। जयंती समारोह की अध्यक्षता वयोवृद्ध समाज सेवी रामेश्वर प्रसाद मौर्य ने किया।
जयंती समारोह को संबोधित करते हुए सामाजिक चिंतक डॉ. सुनील दत्त ने कहा कि सावित्रीबाई फूले ने विषम परिस्थितियों में शिक्षा की अलख जगाई थी। उन्होंने 28 नवंबर 1890 को अपने पति ज्योतिबा राव फूले के परिनिर्वाण के बाद लगातार 7 वर्षों तक सत्य शोधक समाज का संचालन किया। सावित्रीबाई फूले एक शिक्षिका, एक लेखिका, एक कवयित्री और एक समाज सेविका के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने तत्कालीन समाज में प्रचलित मान्यताओं यथा- बाल विवाह और सती प्रथा का खंडन किया तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया था।
बुद्ध विहार कमेटी के संरक्षक इंजीनियर एस.के. आर्या ने कहा की विद्या बिना मति गई, मति के बिना गति गई, गति बिना नीति गई और नीति के बिना वित्त गया। यह सब अकेले अविद्या के कारण हुआ। सावित्रीबाई फूले ने अपने पति ज्योतिबा राव फूले के साथ मिलकर 1 जनवरी 1848 को बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोला था। अपने जीवन काल में फूले दंपति ने दर्जनों विद्यालय खोलकर देश की महिलाओं के लिए शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया था।
इंजीनियर रोहित प्रतिपक्षी ने कहा कि सावित्रीबाई फूले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जनपद स्थित नायगांव में हुआ था। इनका विवाह कम उम्र में 1841 में ज्योतिबा राव फूले से हुआ था। जब इनका विवाह हुआ उस समय यह निरक्षर थी, लेकिन ज्योतिबा राव फूले ने इन्हें पढ़ना लिखना शिखाया। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर छुआछूत, जाति पांति, अंधविश्वास और आडंबरों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
समण संस्कृति के संयोजक आर एस कटियार और डॉ जे.के. भारत ने अपने संबोधन में कहा कि प्लेग से पीड़ित रोगियों की देखभाल करते हुए 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फूले का निधन हो गया लेकिन वे जब तक जिंदा थीं तब तक लोगों की सेवा करती रहीं और शिक्षा की मसाल जलाए रखीं। सत्येश गौतम, प्रीतम कुमार, पुष्पा देवी, कमला बौद्ध, बुद्ध विहार कमेटी के अध्यक्ष चंद्रशेखर, राजेंद्र बौद्ध, हरिप्रसाद शास्त्री, विमल किशोर सबरा ने भी माता सावित्रीबाई फुले के जीवन पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर अनिल कांत, आसाराम रावत, श्रीकांत दिवाकर, राजू दिवाकर, नीरज रावत, छोटेलाल गौतम, दीपक मौर्य और सूरज यादव आदि लोगों ने माता सावित्रीबाई फूले को श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इसके साथ ही साथ आयोजन समिति की तरफ से कमला बौद्ध, पुष्पा रावत, अर्चना मोदनवाल, पूजा अग्रहरि, उर्मिला, गीता और सुनीता दिवाकर आदि महिलाओं को अंग वस्त्र एवं बुके भेंट कर सम्मानित किया गया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
plz call me jitendra patel