महर्षि वाल्मीकि सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के शाश्वत प्रतीक हैं : डा. श्रीप्रकाश मिश्र

महर्षि वाल्मीकि जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा महर्षि वाल्मीकि का सामाजिक दर्शन विषय पर संत संवाद कार्यक्रम मातृभूमि सेवा मिशन के तत्वावधान में संपन्न।

कुरुक्षेत्र, वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक 07 अक्टूबर : महर्षि वाल्मीकि ने अपने पुरुषार्थ, परिश्रम एवं तप से अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया। महर्षि वाल्मीकि भारत में सामाजिक एकत्व और समरसता के प्रतीक हैं । उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से संपूर्ण समाज और भूभाग को एक सूत्र में पिरोया। महर्षि वाल्मीकि जी के विचार सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के शाश्वत प्रतीक हैं। उनकी शिक्षाएँ युगों-युगों तक हमारे राष्ट्र के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रकाशित करती रहेंगी। यह विचार महर्षि वाल्मीकि जयंती की जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा महर्षि वाल्मीकि का सामाजिक दर्शन विषय पर आयोजित संत संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों एवं मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा संयुक्त रूप से महर्षि वाल्मीकि के चित्र पर समक्ष दीपप्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन से हुआ। मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने महर्षि वाल्मीकि के सामाजिक दर्शन पर अपने विचार व्यक्त किये एवं उनके जीवन से सम्बन्धित प्रेरक प्रसंग भी प्रस्तुत किये।
महर्षि वाल्मीकि के सामाजिक दर्शन पर चर्चा करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा महर्षि वाल्मीकि जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं हैं बल्कि यह नैतिकता, परिवर्तन और समाज सेवा की प्रेरणा का दिन है। उनका जीवन हर उस व्यक्ति के लिए उदाहरण है जो अपने भीतर की अच्छाई को जगाना चाहता है। आज जब समाज नए मूल्यों और समानता की ओर बढ़ रहा है वाल्मीकि जी की शिक्षाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। आज अगर समाज वाल्मीकि रामायण को जीवन में अपना लें तो जीवन तो सफल होगा ही साथ में यह धरती भी शांत और सुन्दर हो जाएगी। पारिवारिक रिश्ते तभी सफल होते हैं जब सामाजिक मर्यादाओं का पालन होता है। महर्षि ने कहा था कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है। किसी मनुष्य की इच्छा शक्ति अगर उसके साथ हो तो वह कोई भी काम आसानी से कर सकता है।
कार्यक्रम के अतिविशिष्ट जसवीर समाजसेवी जसवीर राणा इस कहा महर्षि वाल्मीकि संस्कृत में काव्यविधा के जन्मदाता माने जाते हैं । यह मान्यता है कि संस्कृत की पहली काव्य रचना उन्हीं के स्वर में प्रस्फुटित हुई । भारत के लगभग सभी काव्य रचनाकारों ने अपना साहित्य सृजन करने से पहले उनकी वंदना की है। कार्यक्रम को गगनदीप, रेणुका, मुकेश, जसविंदर ने बतौर विशिष्ट अतिथि सम्बोधित किया और महर्षि वाल्मीकि के जीवन पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन सुरेश ने किया। आभार ज्ञापन आचार्य नरेश ने किया। कार्यक्रम में प्रवीण राणा, शिवांगी, नरेश, सुरेंद्र सहित अनेक सामाजिक धार्मिक संस्थाओ के प्रतिनिधि एवं गणमान्य जन उपस्थित रहे। कार्यक्रम के समापन पर सहभोज सम्पन्न हुआ।

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