भारतीय योग संस्थान के तत्वावधान में शंख प्रक्षालन शुद्धि क्रिया रविवार, 29 मार्च को

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक। सह संपादक – संजीव कुमारी दूरभाष – 9416191877
संस्थान के योगाश्रम, मिर्जापुर में प्रातः 6:00 बजे से करवाया जाएगा शंख प्रक्षालन।
कुरुक्षेत्र : 24 मार्च, भारतीय योग संस्थान (पंजीकृत) के कुरुक्षेत्र व निकट के योग जिलों के अधिकारियों, कार्यकर्ताओं, साधकों व योग जिज्ञासु आम जनता के लिए शंख प्रक्षालन शुद्धि क्रिया रविवार, 29 मार्च 2026 को प्रात: 6:00 बजे से 10:30 बजे तक संस्थान के योगाश्रम मिर्जापुर में करवाई जाएगी। इस शुद्धि क्रिया को करने के इच्छुक संस्थान के साधक शुक्रवार, 27 मार्च को दोपहर 1:00 बजे तक अपना नाम अपने योग जिले के प्रधान अथवा मंत्री को नोट करवा दें । शंख प्रक्षलन की सुविधा आम जनता के लिये भी उपलब्ध है जो कम से कम पिछले 1 वर्ष से नियमित योगाभ्यास कर रहे हों। उन्हें अपना रजिस्ट्रेशन कृष्ण जिला प्रधान श्री देवी दयाल सैनी जी को उनके व्हाट्सएप नंबर 94675-15206 पर लिखित संदेश भेजकर शुक्रवार, 27 मार्च को सायं 7:00 बजे तक करवाना होगा ताकि सभी के लिए गर्म पानी, नींबू, खिचड़ी इत्यादि की उचित व्यवस्था की जा सके।
उन्हें देसी घी की खिचड़ी के लिये सहयोग राशि ₹120/- प्रति साधक 29 मार्च को ही मौके पर जमा करवानी होगी। शंख प्रक्षालन करने के इच्छुक साधक प्रात: 10:30 बजे तक का समय निकाल कर आएं।
शंख प्रक्षालन है क्या ? यह क्रिया कब की जाती है ? इसे क्यों करें ?
यहां शंख का अर्थ है पेट या आंतें और प्रक्षालन का अर्थ है धोना । इस क्रिया से हमारी अंत:वाहिनी नली ( Alimentary Canal) कंठ से गुदा तक शुद्ध हो जाती है । इस प्रकार पूरे शरीर का शुद्धिकरण तथा विषैले तत्वों का निष्कासन हो जाता है।
यह क्रिया बदलते मौसम में वर्ष में दो बार मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर में की जाती है।
निषेध : हृदय रोगी, अधिक उच्च रक्तचाप, पेट के अल्सर, आंतों में सूजन या कमजोरी, 6 माह पहले हुए पेट के ऑपरेशन वाले रोगी, मासिक धर्म में महिलाएं शंख प्रक्षालन क्रिया न करें।
शंख प्रक्षालन के लाभ :
पेट के रोग, फेफड़े, वात-पित्त-कफ के रोग, गर्मी से होने वाले रोग, सर्दी जुकाम, नेत्र संबंधी विकार तथा सिर दर्द इस क्रिया से ठीक होते हैं। धूम्रपान आदि की आदतें भी इससे छूट जाती हैं। और 6 महीने बहुत अच्छे से निकलते हैं।
शंख प्रक्षालन क्रिया की विधि :
इस क्रिया में पहले से अच्छी तरह उबाला हुआ नीम गर्म पानी एक से दो गिलास उकड़ूं बैठकर पीने के पश्चात शंख प्रक्षालन के पांच आसन (ताड़ासन, तिर्यक ताड़ासन, कटि चक्रासन, तिर्यक भुजंगासन तथा उदराकर्षणासन) किए जाते हैं। पानी पीने और आसन करने के पांच-पांच सेट के बाद शौच के लिए शौचालय जाना होता है। इस प्रकार यही क्रिया 5 से 6 बार दोहराई जाती है। इस क्रिया में पहले मल बाहर निकलता है। फिर मल मिश्रित जल, फिर गंदा व बदबूदार पानी, फिर पानी के साथ मल के छोटे-छोटे टुकड़े और अंत में स्वच्छ पानी निकलने पर यह क्रिया पूर्ण हो जाती है । इसके पश्चात कुंजल क्रिया, रबड़ या सूत्र नेति और जल नेति भी की जाती है। शव आसन के पश्चात अच्छी तरह पकी हुई चावल व मूंग की दाल की कम नमक वाली देसी घी से निर्मित खिचड़ी आंतों में घी का लेप करके पित्त के प्रकोप से बचाती है।
शंख प्रक्षालन करने वाले साधकों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव :
शंख प्रक्षालन क्रिया करने वाले साधक एक दिन पहले पानी अधिक पीएं । सायं काल का भोजन या तो न करें या शाम को ताजा फलों का रस पीएं अथवा सूर्यास्त के 1 घंटे बाद तक हल्का व सुपाच्य भोजन करके रात्रि में पूरी नींद लें ताकि सुबह उनकी क्रिया भली भांति संपन्न हो सके।
सावधानियां :
केवल वही साधक शंख प्रक्षालन क्रिया करें जो कम से कम पिछले 1 वर्ष से योगाभ्यास कर रहे हों।
शंख प्रक्षालन हर बार (कम से कम पहली बार तो अवश्य) किसी योग्य शिक्षक की देखरेख में करना चाहिए।
शंख प्रक्षालन के पश्चात भूख हो या ना हो खिचड़ी खाना अत्यंत आवश्यक है। उसमें भी पर्याप्त मात्रा में घी का होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
क्रिया के तीन घंटे बाद तक सोना व ठंडा पानी पीना मना है । आवश्यकता हो तो केवल गुनगुना पानी ही पिएं।
उस दिन संध्या का भोजन भी खिचड़ी और घी वाला ही हो।
अगले दो दिन भी सादा व सुपाच्य भोजन ही करें।
दूध व दूध से बनी सभी चीजों से कम से कम तीन दिन परहेज रखें।
भोजन में मिर्च-मसाले, अचार इत्यादि का प्रयोग न करें।
शंख प्रक्षालन करते समय कपड़े ढीले परन्तु शालीन हों।
क्रिया के पश्चात चार-पांच घंटे तक कोई भारी शारीरिक श्रम न करें।
उच्च रक्तचाप वाले साधक शंख प्रक्षालन करते समय नमकीन पानी न पीकर सादा पानी ही पियें।
सभी साधक अपने साथ नीचे बिछाने के लिए एक चद्दर ( सफेद या हल्के रंग की हो तो अच्छा होगा), दरी, शुद्धि क्रियाओं के लिए लोटा, रबड़ या सूत्र नेति अवश्य साथ लेकर आऐं अथवा आश्रम के सामग्री स्टोर से उस दिन प्रातः 6:15 बजे से पहले अवश्य खरीद लें।
मिथ्या भ्रम :
प्रत्येक साधक को लगता है कि मेरा निष्कासन ठीक है तो मेरा पेट भी साफ होगा परंतु जब वह यह क्रिया करते हैं और उनकी आंतों में जमा मल टुकड़े-टुकड़े होकर बाहर निकलता है तो उसका सारा भ्रम दूर हो जाता है।
शंख प्रक्षालन क्रिया से शुद्ध होने वाली मानव आहार नाल।




