लखनऊ से दिल्ली के बीच पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेंटर बना एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज बरेली

दीपक शर्मा (जिला संवाददाता )

बरेली : रुहेलखंड और कुमायूं क्षेत्र का पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में सफल
एक वर्ष से पीठ दर्द से जूझ रही महिला को मल्टीपल मायलोमा से मिली राहत, जल्द स्थापित होगी समर्पित बोन मैरो ट्रांसप्लांट विंग
बरेली। चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए श्रीराम मूर्ति स्मारक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज), बरेली ने रुहेलखंड और कुमायूं क्षेत्र का पहला सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट (अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण) संपन्न कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस उपलब्धि के साथ एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज लखनऊ और दिल्ली के बीच ऐसा पहला संस्थान बन गया है जहां मरीजों को यह उन्नत एवं जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
यह जानकारी शनिवार को आयोजित प्रेस वार्ता में दी गई।
प्रेस वार्ता में बताया गया कि बनबसा (उत्तराखंड) निवासी 47 वर्षीय महिला कमला (बदला हुआ नाम) पिछले एक वर्ष से अधिक समय से लगातार पीठ दर्द और कमजोरी की समस्या से परेशान थीं। प्रारंभिक जांचों के बाद उन्हें मल्टीपल मायलोमा, जो कि रक्त कैंसर का एक प्रकार है, होने की पुष्टि हुई। इसके बाद एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने उनका चरणबद्ध उपचार शुरू किया।
विशेषज्ञों ने पहले आधुनिक टारगेटेड थेरेपी और कीमोथेरेपी के माध्यम से कैंसर को नियंत्रित किया। उपचार के सकारात्मक परिणाम आने के बाद भविष्य में बीमारी की पुनरावृत्ति की संभावना कम करने के उद्देश्य से बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सलाह दी गई। परिवार की सहमति के बाद 19 मई 2026 को ऑटोलोगस बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया गया। इस प्रक्रिया में मरीज के शरीर से ही स्वस्थ स्टेम सेल्स लेकर उन्हें दोबारा शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। वर्तमान में मरीज स्वस्थ हैं तथा शीघ्र ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी जाएगी।
गंभीर रक्त रोगों के उपचार में नई उम्मीद बना बोन मैरो ट्रांसप्लांट चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट अथवा स्टेम सेल ट्रांसप्लांट गंभीर रक्त रोगों और कुछ प्रकार के कैंसर के उपचार में आधुनिक चिकित्सा की अत्यंत प्रभावी तकनीक बनकर उभरा है। यह उपचार विशेष रूप से उन मरीजों के लिए उपयोगी होता है जिनका बोन मैरो सामान्य रूप से स्वस्थ रक्त कोशिकाओं का निर्माण नहीं कर पाता।
बोन मैरो शरीर का वह स्पंजी ऊतक है जो हड्डियों के भीतर मौजूद रहता है और लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं तथा प्लेटलेट्स बनाने का कार्य करता है। जब यह प्रक्रिया बाधित होती है तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और रक्त निर्माण प्रणाली प्रभावित होने लगती है।
विशेषज्ञों के अनुसार ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में मरीज की विस्तृत चिकित्सकीय जांच की जाती है, जिसके बाद मरीज अथवा डोनर से स्टेम सेल्स एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद कीमोथेरेपी अथवा अन्य आवश्यक उपचार देकर शरीर को नई कोशिकाओं के लिए तैयार किया जाता है। निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत स्वस्थ स्टेम सेल्स रक्त प्रवाह के माध्यम से शरीर में पहुंचाए जाते हैं। कुछ सप्ताह बाद ये नई रक्त कोशिकाओं का निर्माण प्रारंभ कर देते हैं।
ज्यादा मरीजों तक सुविधा पहुंचाने के लिए बनेगी बोन मैरो ट्रांसप्लांट विंग : देव मूर्ति
एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति ने मेडिकल कॉलेज की स्थापना और संस्थान की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि तेजी से बदलती स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू की गई।
उन्होंने बताया कि पहले सफल ट्रांसप्लांट के बाद चार अन्य मरीज भी इस सुविधा के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। अधिक से अधिक मरीजों तक इसका लाभ पहुंचाने के लिए जल्द ही एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में समर्पित बोन मैरो ट्रांसप्लांट विंग स्थापित की जाएगी।
कैंसर उपचार की सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध : डॉ. पियूष अग्रवाल
आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. पियूष अग्रवाल ने कहा कि कैंसर आज एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रहा है। उन्होंने बताया कि विश्व के प्रमुख चिकित्सा केंद्रों की तरह कैंसर उपचार के मुख्य आधार रेडिएशन, सर्जरी और कीमोथेरेपी हैं तथा ये सभी सुविधाएं एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध हैं।
उन्होंने बताया कि संस्थान में अत्याधुनिक उपकरण, विशेषज्ञ चिकित्सक और कैंसर उपचार की समग्र व्यवस्था मौजूद है। साथ ही भविष्य में यहां थैलेसीमिया मरीजों के लिए भी बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाएगी।
इनसेट बोन मैरो ट्रांसप्लांट को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कहा जाता है : डॉ. दिशा सत्या
क्लीनिकल हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. दिशा सत्या ने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक जीवनरक्षक चिकित्सा प्रक्रिया है। इसमें मरीज के स्वयं के या डोनर के स्वस्थ स्टेम सेल्स को शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है।
उन्होंने बताया कि ट्रांसप्लांट दो प्रकार का होता है—

  • ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट – मरीज के अपने स्टेम सेल्स का उपयोग
  • एलोजेनिक ट्रांसप्लांट – उपयुक्त डोनर के स्टेम सेल्स का उपयोग
    उन्होंने कहा कि ब्लड कैंसर, थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया और अन्य जटिल रक्त रोगों में यह तकनीक अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है।
    इनसेट मल्टीपल मायलोमा को नियंत्रित करने में ट्रांसप्लांट प्रभावी : डॉ. श्रीनिवास अनादि नायडू मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. श्रीनिवास अनादि नायडू ने बताया कि मल्टीपल मायलोमा रक्त कैंसर का एक प्रकार है जो बोन मैरो में मौजूद प्लाज्मा कोशिकाओं को प्रभावित करता है। इसके कारण हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है।
    उन्होंने बताया कि लगातार हड्डियों में दर्द, अत्यधिक थकान, खून की कमी और बार-बार संक्रमण इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा में कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी, रेडिएशन और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के माध्यम से इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
    प्रेस वार्ता का संचालन एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के निदेशक आदित्य मूर्ति ने किया। इस अवसर पर प्रिंसिपल एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) डॉ. एम.एस. बुटोला, मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. आर.पी. सिंह, कैंसर विभाग के चिकित्सक, स्टाफ तथा बोन मैरो ट्रांसप्लांट टीम के सदस्य उपस्थित रहे।

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