





पुरुषोत्तम बाग, ब्रह्मसरोवर बना राष्ट्रभक्ति, धर्म और गौरव का अद्भुत संगम।
कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 16 अगस्त : स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र स्थित ब्रह्मसरोवर के ऐतिहासिक पुरुषोत्तम बाग में 206 फीट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज को फहराकर राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता के संकल्प को नमन किया गया। विशाल तिरंगा आकाश में लहराया तो ब्रह्मसरोवर का पावन तट राष्ट्रप्रेम, आध्यात्मिकता और कुरुक्षेत्र की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा से एकाकार होता दिखाई दिया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि षड्दर्शन साधु समाज के संरक्षक एवं श्री दक्षिण काली पीठ, पिहोवा के पीठाध्यक्ष श्रीमहंत बंसीपुरी महाराज ने कहा कि कुरुक्षेत्र केवल महाभारत की भूमि और श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश की पावन धरती ही नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, कर्तव्य और राष्ट्र धर्म की चेतना का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज जब देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब कुरुक्षेत्र की इस पावन भूमि पर तिरंगे को नमन करना हमारे लिए विशेष आध्यात्मिक और राष्ट्रीय अनुभूति का विषय है।
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव उपेन्द्र सिंघल ने बताया कि पुरुषोत्तम बाग में स्थापित यह राष्ट्रीय ध्वज 206 फीट ऊंचा है और वर्ष 2009 में यहां स्थापित किया गया था। इतने विशाल आकार में फहराता तिरंगा कुरुक्षेत्र आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए राष्ट्रीय गौरव का महत्वपूर्ण आकर्षण है।
महाभारत विजय की स्मृति से जुड़ा पुरुषोत्तम बाग
पुरुषोत्तम बाग ब्रह्मसरोवर के मध्य स्थित एक ऐतिहासिक द्वीप है। यह स्थान कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक स्मृतियों से गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी क्षेत्र में विजय स्तंभ स्थापित किया था। इस कारण यह स्थान विजय, धर्म और कर्तव्य की स्मृति का प्रतीक माना जाता है। यही पुरुषोत्तम बाग आज अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के मुख्य कार्यक्रमों का प्रमुख केंद्र भी बन चुका है। यहां आयोजित होने वाले गीता महोत्सव के कार्यक्रम कुरुक्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक मंच प्रदान करते हैं। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी पुरुषोत्तम बाग में आयोजित आरती में भाग लेकर इस पावन स्थल की महत्ता को और विशेष बनाया था।
द्रौपदी कूप की प्राचीन मान्यता।
पुरुषोत्तम बाग के निकट स्थित प्राचीन द्रौपदी कूप भी कुरुक्षेत्र की धार्मिक एवं पौराणिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्य ग्रहण के अवसर पर इस कूप का जल दूधिया रंग का दिखाई देने लगता है। यह मान्यता कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण, तीर्थ-स्नान और धार्मिक आस्था की प्राचीन परंपरा से जुड़ी हुई है।
ब्रह्मसरोवर-ब्रह्मा की तपोभूमि।
ब्रह्मसरोवर स्वयं कुरुक्षेत्र की धार्मिक पहचान का केंद्र है। पौराणिक परंपरा में इसे वह पावन स्थल माना जाता है जहां ब्रह्माजी ने भगवान शिव की आराधना की थी। इसी कारण ब्रह्मसरोवर सदियों से साधना, तीर्थ-स्नान, यज्ञ, पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख केंद्र रहा है।
तिरंगा और कुरुक्षेत्र- कर्तव्य से राष्ट्रधर्म तक
15 अगस्त का राष्ट्रीय पर्व कुरुक्षेत्र की धरती पर एक विशेष संदेश लेकर आता है। इसी भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्तव्य, धर्म और निष्काम कर्म का संदेश दिया था। गीता का यह संदेश आज भी राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा देता है—अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करना ही सच्ची सेवा है। कुरुक्षेत्र की धरती पर लहराता तिरंगा इसलिए केवल स्वतंत्र भारत की संप्रभुता और स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं, बल्कि गीता के कर्मयोग और राष्ट्र धर्म की आधुनिक अभिव्यक्ति भी है। महाभारत के युद्ध क्षेत्र से लेकर स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक राष्ट्र तक, कुरुक्षेत्र की पहचान हमें कर्तव्य, साहस, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। इस अवसर पर कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सदस्य अशोक रोशा, अलकेश मोदगिल, चेयरमैन गुरनाम सैनी, हरमेश सिंह, गीता जयंती अथॉरिटी के सदस्य विजय नरुला सहित अनेक धार्मिक और सामाजिक संस्थानों के प्रतिनिधि रहे। पर्ल स्कूल के विद्यार्थियों ने मनमोहक प्रस्तुति दी। उपस्थित श्रद्धालुओं और नागरिकों ने राष्ट्रध्वज को सलामी देते हुए भारत माता की जय और वंदे मातरम के जयघोष के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया। 206 फीट ऊंचाई पर लहराता तिरंगा ब्रह्मसरोवर के आकाश में भारत की स्वतंत्रता, सनातन संस्कृति और कुरुक्षेत्र की अमर विरासत का संदेश देता रहा।


