कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं – प्रो. रजनीकांत पांडेय

शोध पद्धति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया पूर्व कुलपति ने,

सुहेलदेव वि. वि. के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा बृहद संगोष्ठी आयोजित,
आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय आजमगढ़ परिसर में स्थित शैक्षणिक भवन एक के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा “शोध पद्धति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता” विषय पर एक महत्वपूर्ण अकादमिक व्याख्यान का आयोजन किया गया, जिसमें सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. रजनीकांत पांडेय मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में संकाय सदस्यों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही, जिससे विषय के प्रति अकादमिक समुदाय की गंभीर रुचि स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।
विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी ने बताया कि कुलपति प्रो. संजीव कुमार जी के दिशा निर्देश के क्रम में परिसर में संबंधित विभागों द्वारा बृहद संगोष्ठी आयोजित की जाती रही है जिससे पठन-पाठन के साथ-साथ नई शिक्षा पद्धति से नई पीढ़ी को अपडेट रखा जाए। इसी परिपेक्ष में राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा एक वृहद संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प अर्पित कर किया गया। प्राध्यापक डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रहरि द्वारा मुख्य अतिथि का औपचारिक स्वागत किया गया एवं छात्रों को यह अवगत कराया गया कि आज के वक्ता पूर्व कुलपति भी रह चुके हैं। प्रो. रजनीकांत पांडेय का स्वागत करते हुए उनके दीर्घ अकादमिक अनुभव, प्रशासनिक दक्षता एवं शोध के क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब ज्ञान-विज्ञान की दुनिया तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, तब शोध पद्धति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अंतर्संबंधों को समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है।अपने व्याख्यान में प्रो. पांडेय जी ने शोध पद्धति की पारंपरिक अवधारणाओं और आधुनिक तकनीकी उपकरणों के समन्वय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक विज्ञान अनुसंधान में भी इसकी उपयोगिता निरंतर बढ़ रही है। डेटा संग्रह, विश्लेषण, पैटर्न पहचान, पूर्वानुमान तथा नीतिगत अध्ययन में एआई आधारित उपकरण शोधकर्ताओं को नई दृष्टि प्रदान कर रहे हैं।
उन्होंने शोधार्थियों को सावधान करते हुए यह भी रेखांकित किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग विवेकपूर्ण एवं नैतिक मानकों के अनुरूप होना चाहिए। शोध की मौलिकता, संदर्भों की शुद्धता तथा निष्कर्षों की विश्वसनीयता को बनाए रखना प्रत्येक शोधकर्ता की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि एआई शोध का विकल्प नहीं, बल्कि एक सहायक साधन है, जिसका उद्देश्य शोध प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और सुसंगठित बनाना है।
प्रो. पांडेय ने अपने दीर्घ अकादमिक अनुभवों का उल्लेख करते हुए यह भी बताया कि भविष्य में अंतःविषयक शोध की भूमिका और अधिक सशक्त होगी, जिसमें तकनीक और सामाजिक विज्ञान का समन्वय अनिवार्य होगा। उन्होंने विद्यार्थियों को नई तकनीकों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने तथा निरंतर अध्ययन और अभ्यास के माध्यम से स्वयं को अद्यतन रखने की प्रेरणा दी।व्याख्यान के पश्चात आयोजित संवादात्मक सत्र में प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक प्रश्न पूछे। शोधार्थियों ने एआई उपकरणों की सीमाओं, डेटा गोपनीयता, शोध नैतिकता तथा सामाजिक प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने प्रश्न रखे, जिनका मुख्य वक्ता ने संतुलित और तथ्यपूर्ण उत्तर दिया। यह सत्र अत्यंत जीवंत और बौद्धिक रूप से समृद्ध रहा।
कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया, इस अवसर पर छात्र-छात्राओं के अतिरिक्त विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण अधिकारीगण एवं गैर शैक्षणिक कर्मचारी उपस्थित रहे।
डॉ. प्रवेश सिंह मीडिया प्रभारी महाराजा सुहेलदेव वि.वि. आजमगढ़ मो नं. 9452 44 58 78

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