आध्यात्मिक ऊर्जा का हुआ अद्भुत संगम : समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।
ब्यूरो चीफ – संजीव कुमारी।
कुरुक्षेत्र : जब समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया और कालिदास बाबा जैसे महान सन्त मिलते है तो विश्व में शांति और चेतना का विस्तार होता है। दो महान विभूतियों का मिलन केवल एक मुलाकात नहीं, बल्कि ज्ञान और प्रेम की एक नई धारा है।
सिद्ध पीठ श्री शिव शक्ति बाबा कालीदास धाम सांपला, रोहतक आश्रम के संस्थापक सिद्ध योगी
अंतरराष्ट्रीय संत यज्ञ सम्राट महामंडलेश्वर स्वामी श्री कालीदास जी महाराज है।
तपस्वी संत श्री श्री 1008 बाबा कालिदास कृष्णानंद परमहंस महाराज ने बताया कि उन्होंने 1984 में अन्न जल का त्याग कर दिया था। उन्हें लगा कि नारियल का जो फल है वो शिव रूप में है। बाहर जटा, अंदर कठोर उसके अंदर फल और उसके अंदर जल होता है। नारियल पानी में सभी तत्व विटामिंस मिल जाते है। इसलिए वो आज तक नारियल पानी पीकर जीवन जीते आ रहे है। वो कई साल तक लता, पत्ता, फल फूल खाकर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सोचा कि धरती की सबसे पवित्र चीज क्या होगी ? उसे खाकर क्यों न जिंदा रहा जाए। नारियल सबसे पवित्र होता है,इसलिए उसी का सेवन करके जीवित हूँ।
श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली, कुरुक्षेत्र के पीठाधीश और
समर्थगुरु धारा हिमाचल के ज़ोनल कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि समर्थगुरु धारा आश्रम में आध्यात्मिक वातावरण है जिसका नेतृत्व समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी करते हैं। यह साधकों को ध्यान योग, आंतरिक जागृति और सचेतन जीवन के माध्यम से एक परिवर्तनकारी मार्ग प्रदान करता है।
हमारे आदरणीय समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी अध्यात्म की जिस ऊँचाई पर हैं आज पृथ्वी पर उस ऊँचाई की चेतना उपलब्ध नहीं है। परमगुरु ओशो की देशना को को, इस धरती पर अगर किसी ने परिपूर्णता से समझा है, तो वे हैं हमारे समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी है।
हमारी दृष्टि में ओशो का सच्चा प्रेमी वही है जो समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी के साथ साधना के पथ पर चल रहा है।
परमगुरु ओशो को संपूर्णता से समझने के लिए पृथ्वी के बैकुंठ, अध्यात्म की यूनिवर्सिटी, समर्थगुरु धारा, मुरथल , हरियाणा में में सभी सच्चे साधकों का हार्दिक स्वागत है।
आदरणीय समर्थगुरू जी अपने प्रवचनों में बताते है कि
मानो मत स्वयं जानो। स्वयं का अनुभव बहुत आवश्यक है।
प्रथम तल के कार्यक्रम सिद्धार्थ ध्यान योग में समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया की कृपा से प्रसाद स्वरूप सभी साधकों को अनाहत नाद ओंकार दीक्षा दी जाती है। सनातन धर्म में जीवित सदगुरू की मुख्य भूमिका होती है। परमगुरु ओशो ने अपने प्रवचनों में कहा है कि मेरे जाने के बाद सच्चे शिष्य वही है जो जीवित सदगुरू के सान्निध्य में ही आध्यात्मिक यात्रा करते है। समर्थगुरू धारा आनंद और उत्सव की धारा है।
सनातन धर्म की पुन: स्थापना के लिए 5 जरूरी बातें है :
शक्तिशाली एवं समृद्ध हिन्दू राष्ट्र की स्थापना।
जातिमुक्त समाज की स्थापना।
सामुदायिक एकता
सांस्कृतिक एकता
आध्यात्मिक केन्द्रों का विकास।




