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षडदर्शन साधुसमाज ने किया अष्टकोसी परिक्रमा के श्रद्धालुओं का स्वागत

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षडदर्शन साधुसमाज ने किया अष्टकोसी परिक्रमा के श्रद्धालुओं का स्वागत

ब्यूरो चीफ – संजीव कुमारी।

सौभाग्यशाली श्रद्धालु ही कर पाते है अष्टकोसी तीर्थो की यात्रा पूरी।
बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन सिंह किरमच ने नाभिकमल मंदिर से अष्टकोसी तीर्थ यात्रा का किया शुभारंभ। नाभिकमल मंदिर में पूजा-अर्चना से शुरु हुई यात्रा।

कुरुक्षेत्र,18 मार्च : षडदर्शन साधुसमाज के मुख्यालय श्री अवधूत आश्रम के परमाध्यक्ष एवं षडदर्शन साधुसमाज के अध्यक्ष परमहंस ज्ञानेश्वर जी महाराज,उपाध्यक्ष महंत गुरुभगत सिंह,संगठन सचिव वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक, सचिव महंत सुनील दास, महंत स्नेह दास संत समाज ने आश्रम परिसर में अष्टकोसी परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुओं का स्वागत किया ओर प्रसाद चाय की व्यवस्था की।
परमहंस ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा कि सौभाग्यशाली श्रद्धालु ही कर पाते है अष्टकोसी परिक्रमा। यह अष्टकोसी यात्रा पवित्र सरस्वती के किनारे स्थित विभिन्न तीर्थों पर पहुंची।
इससे पहले सुबह के समय दर्रा खेड़ा नाभिकमल मंदिर में केडीबी व संस्थाओं के सहयोग से आयोजित अष्टकोसी यात्रा का हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन सिंह किरमच, नप की पूर्व अध्यक्षा उमा सुधा, केडीबी के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल, सीईओ केडीबी पंकज सेतिया ने नाभकमल मंदिर में पूजा-अर्चना कर अष्टकोसी तीर्थ यात्रा का विधिवत शुभारंभ किया।
महाराज जी ने बताया कि इन कार्यक्रमों के माध्यम से कुरुक्षेत्र की प्राचीन और ऐतिहासिक परम्पराओं को जीवंत करने का प्रयास किया जा रहा है। इन प्रयासों में अष्टकोसी यात्रा भी शामिल है। कुरुक्षेत्र की परिक्रमा वास्तव में सन्निहित सरोवर की परिक्रमा है इस तीर्थ का विस्तार चारों दिशाओं में दो-दो कोस था, तीर्थ के तट पर स्थापित मंदिरों में दान व स्नान की परम्परा सदियों से चली आ रही है कुरुक्षेत्र की अष्टकोसी परिक्रमा भी पितृ जनों की मुक्ति दिलाने वाली व अक्षय फल प्राप्त गामी होती है।
हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन सिंह किरमच ने कहा कि कुरुक्षेत्र अष्टकोसी परिक्रमा हजारों साल पुरानी है। सर्वप्रथम ब्रह्मा विष्णु महेश त्रिदेवों ने उपवास रख जन नियंता भगवान ने सृष्टि का निर्माण करने के लिए अष्टकोशी की परिक्रमा की और अपने-अपने देवत्व भार को ग्रहण कर सृष्टि संयोजन का कार्य प्रारंभ किया। त्रिदेवों के पश्चात सैकड़ों सालों से सदैव प्रतिवर्ष देवता और धार्मिक पुरुषों ने अष्टकोसी भूमि की यात्रा अनवरत रूप से जारी रखी। एक बार यात्रा करने पर मनुष्य की समस्त मनोकामना को पूरा करने वाली, दो बार अष्टकोसी यात्रा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है और तीन बार अष्टकोसी यात्रा करने पर अक्षय लोक की प्राप्ति होती है। आदिकाल से चली आ रही यह परिक्रमा साहसिक तीर्थ यात्रा है। खेतों की छोटी-छोटी पगडंडी पर सरस्वती नदी के किनारे किनारे चलते हुए लगभग 24 किलोमीटर की यह यात्रा सूर्योदय से नाभिकमल मंदिर से चलकर नाभिकमल मंदिर में सूर्यास्त तक पूर्ण होती है।
केडीबी के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल ने कहा कि कुरुक्षेत्र मोक्षदायक धार्मिक प्रसिद्ध ऐतिहासिक तीर्थ है। यह केवल महाभारत युद्ध भूमि ही नहीं, भगवान कृष्ण के मुखारविंद से प्रकट हुई गीता जन्मस्थली भी है, राजा कुरु के अष्टांग योग यज्ञ, तप,सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, ब्रह्मचर्य से परिपूर्ण मोक्ष प्रदायक स्थान भी है। यह यात्रा नाभिकमल तीर्थ से शुरु होकर सरस्वती के किनारे ओजस तीर्थ से होते हुए स्थानेश्वर तीर्थ, कुबेर तीर्थ, बदर पाचन तीर्थ, क्षीर सागर तीर्थ, पूर्ववाहिनी सरस्वती तीर्थ खेडी मारकंडा, दधीचि तीर्थ, वृद्ध कन्या तीर्थ, रन्तुक यक्ष, पावन तीर्थ, औघड़ तीर्थ, बाणगंगा, उपगया तीर्थ, नरकतारी बाणगंगा से होते हुए नाभिकमल पर समाप्त हुई।
इस अवसर पर गणमान्य लोग मौजूद रहे।

बाईट, अनिल कुमार जोशी उप प्रभागीय वन अधिकारी गौला रेंज।

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