
आजमगढ़। हिन्दी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने में आजीवन संघर्ष करने वाले हिन्दी के दधीचि, राष्ट्रभाषा-आन्दोलन के अपराजेय सेनानी, उर्दू और हिन्दुस्तानी के गढ़ में हिन्दी की विजय-पताका फहराने वाले चन्द्रबलीपुर (नासिरुद्दीनपुर) गांव के निवासी आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय जी का 122वीं जयन्ती समारोह का आयोजन आज़मगढ़ के नेहरू हाल में ’बदलते परिवेश में आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय की प्रासंगिकता’ विषयक एक संगोष्ठी का आयोजन स्वान्तः सुखाय सेवा प्रकल्प चन्द्रबलीपुर (नासिरुद्दीनपुर) आजमगढ़ द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय के चित्र पर पुष्प अर्पित कर किया गया। संयोजक विजय शंकर पाण्डेय द्वारा मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट गण का माल्यार्पण कर आचार्य जी का स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्रम् देकर सम्मानित किया।
इस आयोजन के मुख्य अतिथि मुबारकपुर विधानसभा के विधायक अखिलेश यादव ने कहा कि आचार्य जी की रचनाओं को पढ़कर ही उनके साहित्य योगदान को समझा जा सकता है। इसलिए हमें आचार्य जी की जयन्ती के अलावा भी समय-समय पर इस तरह का आयोजन करके उनके व्यक्तित्व पर चर्चा करनी होगी।
बापू इण्टर कालेज दरगाह मऊ के प्रवक्ता मनोज सिंह ने कहा कि हमारे देश मे हिंदी और हिंदुस्तान का संगम है। जो हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है। आचार्य चंद्रबली पांडेय राष्ट्रभाषा को उद्घोषित करने वाले व्यक्ति थे। इसके लिए उन्हें दधीचि कहा गया, उनका स्वभाव कबीर जैसा था आचार्य चंद्रबली पाण्डेय को पढ़ने की जरूरत है। ऐसा दिग्गज यदि कोई है जो हिंदी के उत्थान के लिए कार्य किया है, वह हैं आचार्य चंद्रबली पाण्डेय।
साहित्यकार व पूर्व भाजपा जिलाउपाध्यक्ष बृजेश यादव ने कहा कि हिंदी के प्रति अपार श्रद्धा रखने वाले विराट व्यक्तित्व के धनी आचार्य चंद्रबली पाण्डेय अनेक भाषाएं जानते थे हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान प्रदान करने के लिए जो काम उन्होंने किया यह काबिले तारीफ है।
प्रख्यात रंगकर्मी अभिषेक पंडित ने अपने उद्बोधन में कहा कि आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय भाषा ज्ञान की भंडार थे, उनका मूल्यांकन करने के लिए एक शोधपीठ की स्थापना करनी होगी क्योंकि आचार्य जी की कालिदास व शूद्रक जैसी रचनाएं भारतीय नाट्य परंपरा की आत्मा में समाहित किए हुए हैं।
साहित्यकार सुभाष तिवारी कुंदन ने कहा कि आचार्य चंद्रबली पांडे व्यक्ति नहीं विचार है जो आजमगढ़ की एक धरोहर हैं। चन्द्रबली पाण्डेय का आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शिष्यों में मूर्धन्य स्थान था। गुरुवर्य का प्रगाढ़ स्नेह इन्हें प्राप्त था। अपने पिता का यही नाम होने के कारण आचार्य शुक्ल इन्हें शाह साहब कहा करते थे।
समाजसेवी व विधिवे बृजेशनन्दन पाण्डेय ने अपने संबोधन में कहा कि आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय जी आजीवन हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्षरत रहे। आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय राजभाषा आन्दोलन के प्रणेता थे। उन्होंने आगे कहा कि चन्द्रबली पाण्डेय आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहे। उनके स्वभाव में सरलता और अक्खड़पन का अद्भुत मेल था। निर्भीकता और सत्यप्रेम इनके नैसर्गिक गुण थे।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष प्रेम प्रकाश राय ने कहा कि आचार्य जी ने जीवन में कभी पराजय स्वीकार नहीं की थी। अभाव, कष्ट और कठिनाइयों को वे नगण्य मानते रहे थे। जीवन का एकमात्र लक्ष्य साहित्य साधना थी।
इस इस अवसर पर दुर्गेश पाण्डेय, मनोज यादव, विवेक जायसवाल, हरिनारायण उपाध्याय, मदन मोहन पाण्डेय, नंदगोपाल पाण्डेय, हेमंत सिंह, मधुसूदन पाण्डेय, आलोक पाठक, बृजेश कुमार यादव, आदर्श शुक्ला, रवि कनौजिया, संदीप पाण्डेय, रमेश राय, जन्मेजय पाठक, प्रेम बहादुर सिंह, चंद्रजीत राजभर, जाहिद खान, व गुफरान खानं सहित अनेकों लोग उपस्थित रहे।
अन्त कार्यक्रम के संयोजक व स्वान्तः सुखाय सेवा प्रकल्प के मैंनेजिंग ट्रस्टी विजय शंकर पाण्डेय ने सबका आभार व्यक्त किया और संचालान परितोष पाण्डेय कन्हैया व उमेश दास ने संयुक्त रूप से किया।


