परमात्मा को जानकर उसके प्रेम में जीना ही भक्तियोग है : समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया

परमात्मा को जानकर उसके प्रेम में जीना ही भक्तियोग है : समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया।

वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।

कुरुक्षेत्र : श्री दुर्गा देवी मन्दिर पिपली के पीठाधीश और समर्थगुरू मैत्री संघ हिमाचल के जोनल कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. मिश्रा ने उर्स मुबारक 26 मार्च 2025 के कार्यक्रम में गद्दी नशीन सुरेन्द्र खुराना बाबा जी और उनके परिवार के सदस्य यूनाइटेड किंगडम से आई बेटी वैशाली, आस्ट्रेलिया से आए अमन खुराना और आकांक्षा खुराना को आदरणीय समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता भेंट की गई।
पीर शकी मोहम्मद अली का मानवता के लिए अपना जीवन समर्पित किया था। उनकी याद में सभी भक्तों के लिए भंडारा और भगवती जागरण का कार्यक्रम आयोजित हुआ। मोनू जटाधारी और पार्टी ने मां की भेंटे गाई और सुंदर झाकियां निकाली। सभी भक्त जनों का आभार प्रकट किया और बताया कि समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया द्वारा रचित ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ सहजयोग के मार्ग को उजागर करती है जो आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम ग्रंथ है।
सहज योग के 5 उपादान है जिसे गीता में स्थापित किया गया है :
सहज योग : सहज रहो। सम्यक रहो। समत्वम योग उच्यते (गीता, अध्याय2,श्लोक48) अर्थात् सम्यकता ही योग है। साधना के गृह त्याग की जरूरत नहीं है।
ओंकार: यह आत्मा में गूंजता हुआ अनाहात नाद और जगमगाता हुआ आलोक है। इसे ॐ,नाद,अनहद नाद, प्रणव,सतनाम,नाम,शब्द, सार शब्द, गूंज,राम, अपूर्वश्रुत , लोगस, वर्ड,सदा ए आसमानी, बांग ए आसमानी आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
अर्थात ओंकार का सुमिरन करता हुआ जो देह त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है।
ज्ञानयोग : मैं अजर अमर आत्मा हूं। यह जानना ज्ञान योग है।
भक्तियोग : परमात्मा को जानकर उसके प्रेम में जीना भक्तियोग है।
कर्मयोग: भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कर्मयोग पर सर्वाधिक बल दिया है। सकाम कर्म बंध में और निष्काम कर्म मुक्ति में ले जाता है।
श्रीमद्भ भगवदगीता का बहुत सुन्दर भावानुवाद उन सभी को समर्पित है,जो भगवान कृष्ण को प्रेम करते है तथा गीता में प्रतिपादित सहजयोग के मार्ग पर चलना चाहते है। यह सभी साधकों के लिये पठनीय और संग्रहणीय है। जिसको समर्थगुरु धाम के गैलेरिया, मुरथल से साधक गण प्राप्त कर सकते है और अपने जीवन को बहुत सुंदर बना सकते है।

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