विद्यार्थियों की प्रतिभा और शोध आयुष के विकास की आधारशिला : कुलपति

श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में फार्माकोविजिलेंस विषय पर पेपर एवं पोस्टर प्रतियोगिता में पीजी स्कॉलर्स ने दिए सुझाव।
थानेसर, प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 17 मार्च : श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान पेपर प्रेजेंटेशन और पोस्टर प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों ने फार्माकोविजिलेंस और आयुष औषधियों की सुरक्षा से जुड़े विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए। पेपर प्रेजेंटेशन प्रतियोगिता में द्रव्यगुण विज्ञान विभाग की पीजी स्कॉलर्स डॉ. विपाशा ने प्रथम,रसशास्त्र एवं भैषज्यकल्पना विभाग की पीजी स्कॉलर्स डॉ. मीनल सिंगल ने द्वितीय तथा उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की छात्रा डॉ. प्रगति नेगी तृतीय स्थान पर रही। वहीं, पोस्टर प्रतियोगिता में प्रसूति तंत्र एवं स्त्री रोग विभाग की द्वितीय वर्ष की पीजी स्कालर्स डॉ. प्राजक्ता चौधरी प्रथम, काय चिकित्सा विभाग की पीजी स्कॉलर डॉ. दिव्या सरदाना दूसरे तथा संहिता एवं सिद्धांत विभाग की प्रथम वर्ष की पीजी स्कॉलर्स डॉ. मंजीता तीसरे स्थान पर रही। प्रतियोगिता में निर्णायक मंडल की भूमिका डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रोफेसर डॉ. रणधीर सिंह, प्रोफेसर डॉ. रविंद्र अरोड़ा, डॉ. ममता राणा, प्रोफेसर डॉ. आशु, प्रोफेसर डॉ. सुनीति तंवर,डॉ. आशीष नांदल ने निभाई। इस अवसर पर आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने प्रतियोगिता में विजेता विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार की शैक्षणिक गतिविधियां विद्यार्थियों में शोध की भावना को मजबूत करती हैं और उन्हें विषय की गहराई से समझ विकसित करने का अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने कहा कि फार्माकोविजिलेंस जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विद्यार्थियों द्वारा किए जा रहे शोध और प्रस्तुतीकरण आयुष चिकित्सा पद्धति को और अधिक वैज्ञानिक, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वहीं,कुलसचिव प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह तोमर ने सभी प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि विद्यार्थी भविष्य में भी ऐसे शोध कार्यों और अकादमिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लें, ताकि आयुष चिकित्सा प्रणाली के विकास और समाज के स्वास्थ्य हित में सार्थक योगदान दिया जा सके। इस अवसर पर आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता समेत अन्य उपस्थित रहे।
आयुष सुरक्षा पोर्टल के माध्यम से दवाओं की सुरक्षा की निगरानी जरूरी।
द्रव्यगुण विज्ञान विभाग की फाइनल ईयर की पीजी स्कॉलर्स डॉ. विपाशा ने “डिजिटल फार्माकोविजिलेंस इन आयुष : ड्रग सेफ्टी मॉनिटरिंग में आयुष सुरक्षा पोर्टल की भूमिका” विषय पर प्रस्तुति देकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्होंने आयुष मंत्रालय द्वारा संचालित आयुष सुरक्षा पोर्टल के माध्यम से दवाओं की सुरक्षा की निगरानी और दुष्प्रभावों की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
वहीं, रसशास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग की पीजी स्कॉलर्स डॉ. मीनल सिंगल ने वैद्य, नर्सिंग ऑफिसर, फार्मासिस्ट और शोधार्थियों को फार्माकोविजिलेंस की प्रक्रिया के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, सीएमई, जागरूकता अभियान, एडीआर रिपोर्ट की हैंड्स-ऑन प्रैक्टिस तथा वर्कशॉप इत्यादि कराई जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने एडीआर रिपोर्टिंग के लिए एक विशेष मोबाइल ऐप विकसित करने का भी सुझाव दिया। वहीं,उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की छात्रा डॉ. प्रगति नेगी ने आयुष औषधियों एवं चिकित्सीय प्रक्रियाओं की सुरक्षा की निगरानी विषय पर अपनी प्रस्तुति देते हुए तृतीय स्थान हासिल किया।
सोशल मीडिया पर भ्रामक विज्ञापन की मॉनिटरिंग जरूरी
वहीं,पोस्टर प्रतियोगिता में प्रसूति तंत्र एवं स्त्री रोग विभाग की द्वितीय वर्ष की पीजी स्कालर्स डॉ. प्राजक्ता चौधरी ने “हर्बल हाइप बनाम हर्बल सेफ्टी : मिसलीडिंग ड्रग्स एडवरटाइजमेंट की चुनौती” विषय पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया के माध्यम से आयुष औषधियों के भ्रामक विज्ञापनों के जरिए लोगों को गुमराह किया जा रहा है। ऐसे मामलों को रोकने के लिए विज्ञापन मॉनिटरिंग, नियामक रिपोर्टिंग और जन-जागरूकता बेहद जरूरी है।
इसके अलावा कायचिकित्सा विभाग की पीजी स्कॉलर डॉ. दिव्या सरदाना ने “पेशेंट सेफ्टी को बढ़ावा देने के लिए हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की फार्माकोविजिलेंस स्किल्स को सुदृढ़ करने” विषय पर अपने विचार साझा किए।
संहिता एवं सिद्धांत विभाग की प्रथम वर्ष की पीजी स्कॉलर्स डॉ. मंजीता ने “आयुर्वेद में कॉस्मेटोविजिलेंस की समझ : भविष्य के चिकित्सकों का ज्ञान, दृष्टिकोण और व्यवहार” विषय पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि आयुर्वेदिक कॉस्मेटिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि सभी उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित हों। इसलिए उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कॉस्मेटोविजिलेंस की व्यवस्था बेहद आवश्यक है।




