चरित्र, संस्कार और शिक्षाः सशक्त राष्ट्र की आधारशिला : स्वामी ज्ञान मंगलदास

अंबेडकरवाद की सही समझ मूल लेखन के अध्ययन से ही संभवः प्रो. वीरेंद्र पाल।
बाबा साहब का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोतः डॉ. प्रीतम सिंह।
केयू में डॉ. अंबेडकर जयंती पर युवा गोष्ठी का आयोजन।

थानेसर, प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 13 अप्रैल : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर “डॉ. अंबेडकरः राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका” विषय पर युवा गोष्ठी का आयोजन कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में सीनेट हॉल में डॉ. अंबेडकर अध्ययन केंद्र एवं स्वामी विवेकानंद विचार मंच के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं वंदे मातरम् के साथ हुआ।
आशीर्वचन देते हुए प.पू. स्वामी ज्ञान मंगलदास जी ने कहा कि चरित्र, संस्कार और शिक्षा किसी भी सशक्त राष्ट्र की आधारशिला हैं। उन्होंने कहा कि बिना संस्कारों के शिक्षा अधूरी है। शिक्षा ज्ञान देती है, जबकि संस्कार सही दिशा प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें विद्यार्थियों के समग्र विकास, विशेषकर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में श्रेष्ठ संस्कारों को अपनाकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान दें।
अध्यक्षीय संबोधन में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव ले. (प्रो.) वीरेंद्र पाल ने कहा कि आज “अंबेडकरवाद” की विभिन्न व्याख्याएँ प्रचलित हैं, लेकिन वास्तविक समझ तभी विकसित होती है जब व्यक्ति डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर के मूल लेखन का अध्ययन करता है। उन्होंने युवाओं से कम से कम दो मूल पुस्तकों जात- पात का विनाश और शुद्र कौन थे का अध्ययन करने तथा “पढ़ो और पढ़ाओ” की भावना को अपनाने का आह्वान किया। प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बिना पढ़े ही खुद को अम्बेडकरवादी कहने लगते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो डॉ. अम्बेडकर पर लिखी गई किताबें पढ़कर स्वयं को अम्बेडकरवादी मान लेते हैं। लेकिन तीसरी श्रेणी के लोग वे होते हैं, जिन्होंने स्वयं डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मूल रचनाओं को पढ़ा, समझा और अपने जीवन में उतारा है। वही सच्चे अर्थों में अम्बेडकरवादी होते हैं। हमें भी यही प्रयास करना चाहिए कि हम तीसरी श्रेणी के अम्बेडकरवादी बनें। जो विचारों को केवल सुनते नहीं, बल्कि उन्हें समझते हैं, अपनाते हैं , मूल ग्रंथो का मनन करते है, उनको स्वराचित पुस्तके पढकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते हैं।
मुख्य वक्ता डॉ. अंबेडकर अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि बाबा साहब का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से पीछे न हटने का संदेश दिया। अपने संघर्ष और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने देश को ऐसा संविधान दिया, जो समानता, न्याय और बंधुत्व की भावना को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि आज भी समाज में जाति-भेद जैसी कुरीतियाँ मौजूद हैं, जिन्हें समाप्त करना अत्यंत आवश्यक है। युवाओं को केवल व्यक्तिगत सफलता ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता को भी प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि समाज की एकता ही राष्ट्र की शक्ति होती है।
विशिष्ट अतिथि जिला शिक्षा अधिकारी विनोद कौशिक ने शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाकर समाज में बदलाव लाया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा और संघर्ष से सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड (केडीबी) के मानद सचिव डॉ. उपेंद्र सिंघल ने कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भूमि प्राचीन काल से ही धर्म, न्याय और नैतिक मूल्यों की प्रतीक रही है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए गीता के संदेश से लेकर आधुनिक भारत में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर द्वारा स्थापित संवैधानिक मूल्यों तक, यह परंपरा आज भी समाज को दिशा देती है। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ।
इस अवसर पर साधु अनंत प्रकाश दास, प्रो. फकीरचंद, डॉ. धरमवीर, डॉ. सुरेश, डॉ. रमेश सिरोही, डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता, डॉ. परवेश, डॉ. तेलूराम, डॉ. हरिकृष्ण, चिराग, डॉ. संगीता धीर, उपासना सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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