
हिंदी भाषा में विकास की अपार संभावनाएं : प्रो. वीरेंद्र पाल।
विश्व के बाजार के व्यवहार की भाषा है हिंदी : प्रो. महासिंह पूनिया।
कुवि के हिंदी विभाग में अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान का हुआ आयोजन।
कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हिंदी विभाग द्वारा श्रीलंका में हिंदी का विकास और चुनौतियाँ’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान का आयोजन हिंदी विभाग स्थित गणपति चन्द्र गुप्त हॉल में किया गया।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता श्रीलंका की प्रतिष्ठित शिक्षाविद् सुभाषिनी रत्नायका थीं, जो केलानिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका में स्टूडेंट काउंसलर एवं विज्ञान संकाय से संबद्ध हैं ने कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत और श्रीलंका के बीच सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं भावनात्मक संबंधों को सुदृढ़ करने वाला एक सशक्त सेतु है। उन्होंने कहा कि श्रीलंका और भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक संबंध अत्यंत प्राचीन हैं और श्रीलंका की सांस्कृतिक जड़ें भारत से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसी कारण हिंदी के प्रति श्रीलंका के विद्यार्थियों और युवाओं में निरंतर रुचि बढ़ रही है।
उन्होंने बताया कि श्रीलंका के 17 विश्वविद्यालयों में से 12 विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन किया जा रहा है, जबकि श्रीलंकार देश के लगभग 150 विद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। उन्होंने कहा कि आज के वैश्विक परिदृश्य में हिंदी सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। विशेष रूप से पर्यटन, अनुवाद, दुभाषिया सेवाओं, शिक्षण, मीडिया, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा भारत-श्रीलंका व्यापारिक संबंधों में हिंदी जानने वाले युवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत आने वाले श्रीलंकाई विद्यार्थियों तथा श्रीलंका आने वाले भारतीय पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण भी हिंदी का महत्व निरंतर बढ़ रहा है। सुभाषिनी रत्नायका ने कहा कि हिंदी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है, किन्तु इसके व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए आधुनिक तकनीक, डिजिटल शिक्षण सामग्री, प्रशिक्षित शिक्षकों तथा भारत और श्रीलंका के शैक्षणिक संस्थानों के बीच निरंतर सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दोनों देशों के संयुक्त प्रयासों से हिंदी शिक्षा का दायरा और अधिक विस्तृत होगा तथा यह भाषा भारत-श्रीलंका मैत्री को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेंद्र पाल ने बतौर मुख्यातिथि कहा कि हिंदी भाषा में विकास की अपार संभावनाएं हैं। हिंदी आज विश्व समुदाय को जोड़ने वाली प्रमुख भाषाओं में तेजी से अपनी पहचान बना रही है। श्रीलंका जैसे देशों के विद्वानों की सहभागिता से आयोजित ऐसे अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने हिंदी के शुद्ध उच्चारण पर बल देते हुए सभी से अपनी दिनचर्या एवं अध्ययन में मानक भाषा का प्रयोग करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. पूनिया ने कहा कि आज हिंदी विश्व के बाजार के व्यवहार की भाषा बन चुकी है। आज हिंदी भाषा सागरों और सरहदों को पार करके विदेशों में भी अध्ययन-अध्यापन का केंद्र बनी हुई है, जो समस्त हिंदी-प्रेषियों एवं शोधार्थियों के लिए गर्व और गौरव का विषय है। हिंदी आज विश्व स्तर पर अपनी सशक्त पहचान स्थापित कर रही है और ऐसे अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान विद्यार्थियों को वैश्विक संदर्भ में हिंदी की स्थिति एवं संभावनाओं को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है। विभाग द्वारा आयोजित ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों और शोधार्थियों के ज्ञानवर्धन के साथ-साथ उन्हें अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक विमर्श से जोड़ने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है और विश्व के अनेक देशों में हिंदी अध्ययन एवं शोध के नए अवसर विकसित हो रहे हैं।
विशिष्ट अतिथि बैंक ऑफ बड़ौदा की वरिष्ठ प्रबंधक डॉ. सरिता ने बैंकिंग एवं कॉर्पाेरेट क्षेत्र में हिंदी में उपलब्ध अपार रोजगार की संभावनाओं को रेखांकित किया। विशेष अतिथि डॉ. राजेश वधवा ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि यदि वे लगन के साथ हिंदी का अध्ययन करते हैं, तो प्राध्यापक के अतिरिक्त मीडिया, जनसंचार और डिजिटल क्षेत्र में भी अनंत अवसर मौजूद हैं।
व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने मुख्य वक्ता से विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। संवाद सत्र में हिंदी शिक्षण की नवीन पद्धतियों, भारत-श्रीलंका सांस्कृतिक संबंधों तथा वैश्विक स्तर पर हिंदी की संभावनाओं पर सार्थक चर्चा हुई।
इस अवसर पर श्री महेश रत्नायका, पंजाबी विभागाध्यक्ष प्रो. कुलदीप सिंह, इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. एसके चहल, डॉ. लता खेड़ा, डॉ. जसवीर सिंह, डॉ. कृष्ण एवं एलुमनाई डॉ. सुनील कुमार सहित अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।
भारत श्रीलंका प्रधानमंत्री वार्ता की द्विभाषिका रही हैं रत्नायका।
सुभाषिनी रत्नायका की भाषाई दक्षता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका की प्रधानमंत्री डॉ. हरिनी अमरसूर्या के बीच हुई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक से संबंधित आधिकारिक सामग्री का हिंदी अनुवाद किया। यह कार्य भारत- श्रीलंका संबंधों में हिंदी की उपयोगिता और उनकी अनुवाद विशेषज्ञता का प्रमाण है।

