
थानेसर, संजीव कुमारी 30 अगस्त : श्री दुर्गा देवी मन्दिर पिपली (कुरुक्षेत्र) के पीठाधीश और मां दुर्गा चेरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष ज्योतिषाचार्य और वास्तु विशेषज्ञ डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि ईमानदारी और आपसी भरोसा दो ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर हर रिश्ता टिका होता है। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे का हक मारता है, चाहे वह मेहनत की कमाई हो, जमीन- जायदाद का हिस्सा हो, या कोई पुराना कर्ज हो, तो वह सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं करता, बल्कि एक हंसते- खेलते रिश्ते और भरोसे का कत्ल करता है।
आज के समय में यह समस्या इतनी आम हो चुकी है कि सगे भाई- बहन, दोस्त और रिश्तेदार भी एक-दूसरे को धोखा देने से नहीं चूकते। किसी का हक या पैसा मारने के परिणाम बहुत गंभीर और दूरगामी होते हैं।
हमारे शास्त्रों और अनुसंधान में इसके मुख्य प्रभाव ये आए हैं : रिश्तों का हमेशा के लिए टूटना : जमीन- जायदाद के लिए जब एक भाई दूसरे भाई या बहन का हक मारता है, तो बचपन का प्यार नफरत में बदल जाता है। त्योहारों की रौनक खत्म हो जाती है और परिवार बिखर जाते हैं।
दोस्ती का अंत: जब कोई दोस्त मुसीबत में लिए गए पैसे वापस नहीं करता, तो बरसों पुरानी गहरी दोस्ती एक झटके में खत्म हो जाती है।
मानसिक तनाव और डिप्रेशन : जिस व्यक्ति का पैसा डूबता है, वह गहरे मानसिक आघात से गुजरता है। कई बार लोग अपनी पूरी जिंदगी की जमा पूंजी खो देते हैं, जिससे वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।
भरोसा उठ जाना: धोखा खाने के बाद इंसान का पूरी दुनिया और इंसानियत से भरोसा उठ जाता है। वह चाहकर भी किसी दूसरे पर विश्वास नहीं कर पाता।
सामाजिक बदनामी : जो व्यक्ति दूसरों का पैसा मारता है, समाज में धीरे-धीरे उसकी असलियत सबके सामने आ ही जाती है। लोग पीठ पीछे उसकी थू-थू करते हैं।
सामाजिक बहिष्कार: ऐसे धोखेबाज इंसान को लोग शादियों, त्योहारों या किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में बुलाना बंद कर देते हैं। उसके बच्चों को भी समाज में शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।
आर्थिक संकट और कानूनी मुकदमों का चक्कर: हक मारने की वजह से मामले अक्सर कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाते हैं। जमीन-जायदाद के विवादों में सालों-साल केस चलते हैं, जिससे दोनों पक्षों का समय और पैसा बर्बाद होता है।
कारोबार का ठप होना: बाजार में जिस व्यक्ति की साख खराब हो जाती है, उसके साथ कोई भी नया व्यापार या लेन-देन नहीं करना चाहता। धीरे-धीरे उसका खुद का बिजनेस डूब जाता है।
मानसिक शांति का अंत : दूसरों का हक मारकर कोई भी इंसान कभी सुखी नहीं रह सकता। भले ही उसके पास पैसा आ जाए, लेकिन उसकी मानसिक शांति हमेशा के लिए छिन जाती है।
डर का साया: धोखेबाज व्यक्ति हमेशा इस डर में जीता है कि कब उसकी पोल खुल जाएगी या कब उसका शिकार उससे अपना बदला ले लेगा।
निष्कर्ष”पराया धन मिट्टी के समान होता है।” किसी मजबूर का हक मारकर या किसी का पैसा दबाकर इंसान कुछ समय के लिए अमीर जरूर दिख सकता है, लेकिन लंबी रेस में वह अपनी साख, अपने प्रियजन और अपनी मानसिक शांति सब कुछ खो देता है। मेहनत और ईमानदारी से कमाया गया एक रुपया भी उस करोड़ों रुपये से बेहतर है जो किसी की बददुआ और आंसुओं से आया हो।
ईश्वरीय कृपा से मानव जीवन मोक्ष हेतु मिलता हैं।
सभी से प्रार्थना है कि हम सभी सनातन धर्म के नियमों पर चले। ओंकार को जान कर और परमात्मा के सुमिरन में रहे।
हम सभी प्रतिदिन साधना , सेवा, परोपकार, सुमिरन और सत्संग अवश्य करें।


