
लोकेशन रायबरेलीरिपोर्टर विपिन राजपूत
“SHO पुष्पा मैडम के निर्देशन में मनोवैज्ञानिक परामर्श और रिश्तों की गहरी समझ के
माध्यम से दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित कराया गया। आपसी सहमति और भावनात्मक समझ बनने के बाद दोनों खुशी-खुशी अपने घर जाने के लिए तैयार हो गए और एक परिवार को फिर से नया जीवन मिलने का अवसर मिला।
अक्सर कहा जाता है कि रिश्तों की असली समझ सिर्फ किताबों में नहीं, जीवन के अनुभवों में मिलती है। एक साधारण मजदूर भी अपने सीमित संसाधनों में परिवार और रिश्तों की भावनात्मक जिम्मेदारी को बहुत अच्छी तरह समझता है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार पारिवारिक मामलों में यह कहा है कि जहाँ तक संभव हो, रिश्तों को संवाद, समझ और सहमति से बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के साथ-साथ बेटियों और बेटों दोनों को संस्कार, धैर्य और रिश्तों की भावनात्मक समझ देना भी उतना ही आवश्यक है।”
— साइकॉलजिस्ट रूमा परवीन


