समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया और बाबा कालिदास का आध्यात्मिक मिलन हुआ

थानेसर, (संजीव कुमारी) 31 जनवरी: समर्थगुरु धारा मुरथल,सोनीपत के संस्थापक समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया का हिसार प्रवास के दौरान सांपला,रोहतक में श्री श्री 1008 बाबा कालिदास से एक विशेष आध्यात्मिक मुलाक़ात हेतु पहुँचे। लगभग एक घंटे तक चली इस आध्यात्मिक भेंट में विश्व शांति, मानव चेतना के विस्तार एवं सनातन धर्म के सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन एवं सार्थक चर्चा हुई। उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पूर्व समर्थगुरु धाम, मुरथल में आयोजित संत समागम में बाबा कालिदास ने महत्सत्वपूर्ण सहभागिता की थी। उस अवसर पर उन्होंने अपने ओजस्वी आशीर्वचनों से समर्थगुरू धारा के साधकों को भावविभोर एवं अनुग्रहित किया था तथा तभी समर्थगुरु को उनके आश्रम सांपला, रोहतक आगमन का स्नेहपूर्ण आमंत्रण दिया गया था। समर्थगुरू की मुख्य सचिव मां मीराबाई, स्वामी योगेश , मां किरण और मां सीता आदि उपस्थित रहें।
इस आध्यात्मिक भेंट के उपरांत समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी हिसार में आयोजित एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम में ओंकार दीक्षा प्रदान करने हेतु हिसार पहुँचे।
इस कार्यक्रम को लेकर सिद्धार्थ ध्यान योग में 2121 से जुड़े साधकों में विशेष उत्साह एवं आध्यात्मिक उल्लास देखने को मिल रहा है।
श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली, कुरुक्षेत्र के पीठाधीश और
समर्थगुरु धारा हिमाचल के ज़ोनल कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि समर्थगुरु धारा, मुरथल आश्रम में आध्यात्मिक वातावरण है जिसका नेतृत्व समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया करते हैं। यह संतों की अविस्मरणीय भेंट आध्यात्मिक ऊर्जा का एक अद्भुत संगम रही है। जब समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया और बाबा कालिदास जैसे महान संत संयमी एकत्र होते हैं तो विश्व में शांति, प्रेम और चेतना का विस्तार स्वाभाविक रूप से होता है। ऐसी भेंट केवल औपचारिक मुलाक़ात नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा और आध्यात्मिक चेतना की नई धारा का प्रवाह होती है। परमगुरु ओशो को संपूर्णता से समझने के लिए पृथ्वी के बैकुंठ आध्यात्म की यूनिवर्सिटी समर्थगुरु धारा, मुरथल , हरियाणा में में सभी सच्चे प्यासे साधकों का हार्दिक स्वागत है।
आदरणीय समर्थगुरू जी अपने प्रवचनों में बताते है कि
मानो मत स्वयं जानो। स्वयं का अनुभव बहुत आवश्यक है।
प्रथम तल के कार्यक्रम सिद्धार्थ ध्यान योग में समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया जी की कृपा से प्रसाद स्वरूप सभी साधकों को अनाहत नाद ओंकार दीक्षा दी जाती है।
सनातन धर्म में जीवित सदगुरू की मुख्य भूमिका होती है। परमगुरु ओशो ने अपने प्रवचनों में कहा है कि मेरे जाने के बाद सच्चे शिष्य वही है जो जीवित सदगुरू के सान्निध्य में ही आध्यात्मिक यात्रा करते है। समर्थगुरू धारा आनंद और उत्सव की गंगा की तरह पावन धारा है। जिसमें 28 कार्यक्रम साधकों को आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान और संतत्व पथ हेतु बनाए गए है। संसार में सभी वर्ग हेतु प्रज्ञा ,विवेक और आनन्द पूर्वक जीवन जीने के लिए विशेष 40 कार्यक्रम की सुंदर रचना की गई है।
समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया जी के अनुसार सनातन धर्म की पुन: स्थापना के लिए 5 जरूरी बातें है :
शक्तिशाली एवं समृद्ध हिन्दू राष्ट्र की स्थापना।
जातिमुक्त समाज की स्थापना।
सामुदायिक एकता।
सांस्कृतिक एकता।
आध्यात्मिक केन्द्रों का विकास।

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