
मातृभूमि सेवा मिशन अपने सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं के
दायित्व का निर्वाह करते हुए नेपाल की भाषण त्रासदी में असहाय एवं अनाथ बच्चों को सब प्रकार से आवासीय निःशुल्क शिक्षा देने के लिए तैयार है।
थानेसर, संजीव कुमारी 3 सितंबर : नेपाल में हुई प्राकृतिक त्रासदी एवं विनाशकारी बाढ़ में दिवंगतों की आत्मिक शांति के लिए मातृभूमि सेवा मिशन के तत्वावधान में मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा मौन रहकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। विद्यार्थियों ने इस त्रासदी से विश्व के अनेक देशों के पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की एवं संकट में फंसे लोगों की सुरक्षा, राहत एवं बचाव कार्यों के सफलता की भी ईश्वर से कामना की गई। विद्यार्थियों ने घायल लोगों के शीघ्र स्वस्थ होने एवं लापता लोगों के सकुशल वापस होने की प्रार्थना की।
मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा
प्राकृतिक आपदा में होने वाली जनहानि का दर्द किसी एक देश एवं परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी मानवता को प्रभावित करता है। ऐसे समय में पीड़ितों के साथ संवेदना और सहयोग के भाव से खड़ा होना सभी की मानवीय जिम्मेदारी है। श्रद्धांजलि कार्यक्रम में विद्यार्थियों को मानवता, करुणा, सहयोग एवं सहानुभूति के मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया गया।
डॉ . श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा मातृभूमि सेवा मिशन अपने सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं के दायित्व का निर्वाह करते हुए नेपाल की भाषण त्रासदी में असहाय एवं अनाथ बच्चों को सब प्रकार से आवासीय निःशुल्क शिक्षा देने के लिए तैयार है। मातृभूमि सेवा मिशन नेपाल में इस त्रासदी से पीड़ित बच्चों सर्वांगीण विकास करते हुए उन्हें एक आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करेगा। इस संदर्भ में दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास, नेपाल सरकार एवं भारत सरकार से
सभी आवश्यक संपर्क एवं पत्र व्यवहार का प्रयास किया जा रहा है।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा नेपाल की बाढ़ हमें डराने के लिए नहीं, चेताने के लिए आई है। यह कह रही है कि हिमालय को केवल सड़क, सुरंग, बांध और पर्यटन की जमीन समझने की गलती अब महंगी पड़ सकती है। हमें विकास चाहिए, लेकिन जोखिम को समझकर। सड़क चाहिए, लेकिन हर ढलान पर नहीं। बिजली चाहिए, लेकिन हर नदी घाटी को परियोजनाओं से भरकर नहीं। पर्यटन चाहिए, लेकिन पहाड़ की क्षमता से ज्यादा दबाव डालकर नहीं। और सबसे बढ़कर, हमें यह समझना होगा कि हिमालय को टुकड़ों में नहीं बचाया जा सकता। एक ग्लेशियर, एक नदी, एक जंगल, एक ढलान और एक बस्ती-सब एक ही प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा हैं। यह एक वैश्विक जिम्मेदारी है। कार्यक्रम का समापन शांतिपाठ से हुआ।


