
सचखंड श्री हजूर साहिब नांदेड़ की माटी के कण कण छिपा गुरुओं का इतिहास
हरियाणा के 9 जिलों के 800 से ज्यादा श्रद्धालुओं ने किए सचखंड सहित अनेक गुरुद्वारों के दर्शन।
धार्मिक एवं तीर्थ यात्रा पूरी, श्रद्धालुओं का जत्था कुरुक्षेत्र के लिए रवाना।
थानेसर,प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 9 मई : तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब नांदेड़ महाराष्ट्र की माटी के कण कण में गुरुओं का वास है। इस क्षेत्र में श्रद्धालुओं ने गुरुओं के ऐतिहासिक स्थलों, तप स्थलों तथा गुरुद्वारों के दर्शन किए। इन धार्मिक स्थलों के दर्शन के साथ ही 6 दिवसीय मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन यात्रा ऐतिहासिक एवं यादगार क्षणों के साथ संपन्न हुई। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 5 मई को धार्मिक एवं तीर्थ यात्रा को रवाना किया गया था। इस यात्रा में 9 जिलों के 800 से ज़्यादा श्रद्धालुओं ने तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब नांदेड़ महाराष्ट्र के दर्शन किए। यह यात्रा कुरुक्षेत्र के लिए वापस रवाना हो चुकी है और 10 मई को निर्धारित शेड्यूल के अनुसार कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाएगी।
जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी तथा नोडल अधिकारी डा. नरेंद्र सिंह के कहा कि तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब नादेंड महाराष्ट्र की यात्रा ऐतिहासिक एवं यादगार रही। इस यात्रा में शामिल सभी श्रद्धालुओं ने श्री गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी के सचखंड व तपो भूमि, सभी गुरुद्वारों के दर्शन करने के साथ साथ पवित्र गोदावरी नदी, बाबा बंदा सिंह बहादुर का ऐतिहासिक स्थल, नगीना घाटी गुरुद्वारा, माता साहिब कौर जी की तपोभूमि को देखा। इन यात्रियों ने पहली गुरुओं के ऐतिहासिक स्थलों को देखने का मौका मिला है। यह मौका मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के प्रयासों से मिला है।
इस अवसर पर कुरुक्षेत्र के सहायक सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी बलराम शर्मा के अलावा सूचना जनसंपर्क एवं भाषा विभाग से चालक अंकुर राणा, वरिष्ठ कैमरामैन नरेश सैनी, रोहतक से नरेंद्र, यमुनानगर से जय सिंह, करनाल से अविशेष, अंबाला से कृष्ण कुमार, कैथल से गुरप्रीत सिंह, पानीपत से हरपाल सिंह, पलवल से सतीश कुमार, फरीदाबाद से सुरेश कुमार ने यात्रा में अपना पूरा योगदान दिया तथा विभाग के नियमानुसार जो ड्यूटी उन्हें दी गई थी वह भी पूरी तरह से निभाई है।
गुरुद्वारा हीरा घाट साहिब के किए दर्शन
श्रद्धालु लाडवा निवासी रनवंत कौर ने कहा कि इस दर्शनीय यात्रा में बादशाह बहादर शाह यहां गुरु जी के दर्शन के लिए आया तो एक मूल्यवान हीरा सत्कार से गुरु जी को भेंट किया, जो गुरु जी ने तुच्छ समझकर साथ में बह रही गोदावरी नदी में फेंक दिया। बहादर शाह बडा हैरान हो गया कि मैं तो बहुत ही श्रद्धा से यह मूल्यवान हीरा गुरु जी को भेंट किया है, पर इन्हें हीरों की कदर नही वरना इस तरह नहीं करते, गुरु जी ने बहादरशाह की परेशानी देखकर उससे कहा, जरा गोदावरी में नजर तो मारो,जब बहादरशाह ने नदी में झांक कर देखा, तो क्या देखा कि नदी में एक हीरा नहीं बल्कि उसके भेंट किये हुए हीरे से भी कई ज्यादा मूल्यवान और कीमती हीरे नदी में मौजूद है। इस तरह गुरु जी ने उसका अहंकार निवृत किया।
गुरुद्वारा मालटेकडी साहिब के किए दर्शन टेका माथा।
श्रद्धालु स्वरूप सिंह ने कहा कि गुरुद्वारा मालटेकडी का पुरातन नाम चकरी माल और माल टीला कहा जाता है। यहां पर दसवें पातशाह ने श्री गुरु नानक देव जी द्वारा (जब कि आप ने नानक झीय साहिब बिदर जाते वक्त इस स्थान पर निवास किया था।) रखे गुप्त धन को निकालकर गुरुद्वारा संगत साहिब के स्थान पर फौजों में बांटा। बताया जाता है कि गुरु जी ने भविष्यवाणी की थी, कि हमारा बहुत सारा धन यहीं पर पड़ा है, जब खालसे की गिनती 96 करोड़ हो जाएगी, तब यहां से धन लेकर बड़े पैमाने पर खुला लंगर चलाया जाएगा ।
गुरु साहिब जी का घोड़ों का अस्तबल के किए दर्शन।
श्रद्धालु दर्शन खन्ना ने कहा कि बहुत से श्रद्धालु तख्त सचखंड श्री हजुर अभिचल नगर साहिब में घोड़े की सवारी की इच्छा लेकर जाते हैं। अगर उनकी इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे गुरु घर में घोड़े चढ़ाते हैं। इन घोड़ों को इसी जगह पर बने अस्तबल में रखा जाता है। इसमें गुरु महाराज का इस्तेमाल किया हुआ घोड़ा भी शामिल है। यह रिवाज पुराने समय से चला आ रहा है जब दशमेश पिता साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज सचखंड के लिए निकले थे। तब से, महाराज की सवारी के लिए एक घोड़ा रिजर्व किया गया है। इस घोड़े पर कोई नहीं चढ़ सकता। इस घोड़े को खास तौर पर सोने की काठी (बहुत कीमती), बसंतर वगैरह, चांदी की काठी, एक घोड़े और 3-4 दूसरे घोड़ों से सजाया जाता है, साथ ही एक और ढोल बजाने वाला घोड़ा होता है जिस पर ढोल बजाने वाला ढोल बजाता है, और वे यहीं से जाते हैं।
गुरुद्वारा संगत साहिब वाहेगुरु जी का खालसा। वाहेगुरु जी की फतेह।।
श्रद्धालु सतपाल शर्मा ने कहा कि यह गुरुद्वारा संगत साहिब है। दशमेश पिता साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज जब नांदेड शहर में पहली बार आए, तो सब से पहले इसी स्थान पर डेरा लगाए थे।
उनके साथ जो फौज आई उन्होंने गुरु साहिब से मांग की कि, हमें वापस घर जाना है, हमें तनख्वाह दो। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने आपने साथ आए पंज प्यारे सिंह साहिब भाई दया सिंह जी और भाई धरम सिंह जी को हुकम दिए कि श्री गुरु नानक देवजी के समय का गुप्त खजाना,जो माल टेकडी स्थान पर रखा हुआ है,वह खजाना निकाल कर ले आओ। भाई दया सिंह जी और भाई धर्म सिंह जी ने अपने साथ फौज को ले जाकर श्री गुरु नानक देव जी के समय रखे खजाने को माल टेकडी से निकाल कर खच्चरों, बैल गाडीया आदि में भरकर इस स्थान पर ले आए तथा इस स्थान पर खजाने का ढेर लगा दिये। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने इस स्थान पर उनके साथ पंजाब से आए फौजें को ढाला भर-भर कर तनखाह तकसीम किये।
जो पैदल सिपाही था उसे महाराज एक ढाल भर कर, तथा जो घुड़सवार था उसे दो-दो ढाला भर के खजाना तकसीम किये। इसलिए गुरुद्वारा साहिब का नाम गुरुद्वारा संगत साहिब प्रचलित हुआ। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने जिस ढाल से खजाना तकसीम की थी वह ढाल आज भी इस स्थान पर शोभायमान है। संगत दर्शन कर गुरु महाराज की खुशियां प्राप्त कर सकते है।


