वंदे मातरम के 150 वर्ष पर संगीत नाटक अकादमी ने किया 150 नाटकों का मंचन

कुरुक्षेत्र में नाटक युग परिवर्तन ने जीता सबका दिल।
कला कीर्ति भवन में नाटक युग परिवर्तन देख नम हुईं सैकड़ों आँखें, कलाकारों ने बटौरी वाहवाही।
कलम और तलवार की ऐतिहासिक जंग ने दिखाई वंदे मातरम की कहानी, नाटक युग परिवर्तन से कलाकारों ने जगाई देशभक्ति की अलख।
कुरुक्षेत्र के मंच पर जीवंत हुई आजादी की महागाथा, युग परिवर्तन नाटक देख भावुक हुए दर्शक।

कुरुक्षेत्र,प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 16 जुलाई : संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा वंदे मातरम के रचनाकाल के 150 वर्ष पूर्ण होने और महाकवि कालिदास जयंती के ऐतिहासिक अवसर पर देशव्यापी अभियान चलाया गया। इस गौरवशाली राष्ट्रीय नाट्य उत्सव के अंतर्गत देशभर में 150 नाटकों के मंचन की श्रृंखला तैयार की गई। इसी कड़ी में कुरुक्षेत्र के कला कीर्ति भवन में हरियाणा कला परिषद के सहयोग से एक भव्य और ऐतिहासिक नाट्य संध्या का आयोजन किया गया। जिसमें न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के प्रतिभावान कलाकारों द्वारा युग परिवर्तन, वंदे मातरम् की हुंकार नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया। इस नाटक का लेखन और निर्देशन रंगकर्मी विकास शर्मा द्वारा किया गया। इस मौके पर हरियाणा राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के अध्यक्ष सुभाष कलसाना बतौर मुख्यअतिथि पहुंचे।
वीर महापुरुषों की शहादत को याद रखना हमारा कर्तव्यः सुभाष कलसाना।
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथि सुभाष कलसाना ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम के दौरान हरियाणा कला परिषद के उपाध्यक्ष महेश जोशी, न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के अध्यक्ष नीरज सेठी तथा सचिव शिवकुमार ने मुख्य अतिथि को शॉल, स्मृति चिन्ह तथा पौधा भेंटकर स्वागत किया। स्वागत भाषण में महेष जोशी ने कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक धरा पर पधारे सभी अतिथियों, दर्शकों और कलाकारों का अभिनंदन करते हुए नाटक की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कुरुक्षेत्र शहर के स्थानीय रंगकर्मियों और कलाकारों को एक राष्ट्रीय स्तर के अभियान से जोड़ने तथा उन्हें अपनी कला का प्रदर्शन करने का सुनहरा अवसर प्रदान करने के लिए संगीत नाटक अकादेमी का धन्यवाद किया। उन्होनें अकादेमी की अध्यक्षा डा. संध्या पुरेचा का विषेष आभार व्यक्त किया, जिन्होंने हरियाणा कला परिषद को इस राष्ट्रीय मुहिम में शामिल किया। वहीं मुख्य अतिथि सुभाष कलसाना ने कहा कि आजादी हमें खैरात में नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे हमारे पुरखों के खून और अनगिनत बलिदानों की लंबी दास्तान है वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वाधीनता संग्राम की वह धुरी था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप और निर्देशक विकास शर्मा ने नाटक युग परिवर्तन के माध्यम से गौरवशाली इतिहास को मंच पर उतारकर नई पीढ़ी को एक महान सीख दी है, जो कि आज के समय की जरुरत है। इस मौके पर मंच का संचालन डॉ. मोहित गुप्ता ने अपनी साहित्यिक शैली में किया।
कलम और तलवार की ऐतिहासिक जंग ने बांधा समां।
विकास शर्मा के निर्देशन में तैयार नाटक युग परिवर्तन की पटकथा वर्तमान और फ्लैशबैक के तालमेल पर आधारित रही। नाटक की शुरुआत वर्तमान काल के एक घर के बरामदे से होती है, जहाँ 70 वर्षीय देशभक्त दादा अपनी पोती काव्या को वंदे मातरम गीत के पीछे छिपी शहादत की अनकही कहानी सुनाते हैं। इसके बाद रंगमंच सीधे फ्लैशबैक में तब्दील हो जाता है और दर्शक सन् 1770 के बंगाल के उस भयावह और विनाशकारी अकाल के गवाह बनते हैं, जहाँ लोग दाने-दाने को तरस रहे थे, लेकिन क्रूर अंग्रेज अधिकारी उनसे कोड़ों के दम पर जबरन लगान वसूल रहे थे। इस अत्याचार के खिलाफ जब आनंदमठ के संन्यासी योद्धा भवानंद और आम नागरिक तलवारें उठाकर अंग्रेजी सेना पर टूट पड़ते हैं, तो दर्शकों की करतल ध्वनि से पूरा हॉल गूँज उठा। नाटक का सबसे भावुक और वैचारिक मोड़ वह था जब अंग्रेजी सरकार में डिप्टी मजिस्ट्रेट के ऊंचे पद पर तैनात बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय अपनी अंतरात्मा की आवाज पर इस अमर गीत वंदे मातरम को कागज़ पर उतारते हैं। नौकरी जाने और कालकोठरी की परवाह न करते हुए बंकिम बाबू और उनकी पत्नी राजलक्ष्मी के बीच के संवादों ने देशप्रेम की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित किया। इसके बाद, रंगमंच पर महज़ 19 साल के क्रांतिकारी खुदीराम बोस का दृश्य दिखाया गया, जो जेल की यातनाएं सहते हुए भी अंग्रेजों के आगे झुकने से इनकार कर देता है। जेलर का खुदीराम को क्रुरता से प्रताड़ित करना, दर्षकों को भावुक कर देता है। कलाकारों का अभिनय इतना सषक्त रहा कि सभागार में बैठे दर्षक अपने आंसूओं को नहीं रोक पाए। वहीं दूसरी ओर, लंदन की धरती पर जाकर अत्याचारी ब्रिटिश अफसर कर्जन वायली की छाती में गोलियाँ दागने वाले जाँबाज़ मदन लाल धींगड़ा और अदालत में उनका डटकर बचाव करने वाले वीर सावरकर के दमदार दृश्यों ने राष्ट्रभक्ति का ऐसा जोष पैदा किया कि रंगषाला वंदे मातरम के नारों से गूंज उठी। न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के कलाकारों ने अपने अभिनय से हर किरदार को जीवंत कर दिया। नाटक का संगीत, प्रकाश व्यवस्था, मंच सज्जा इतनी सटीक थी कि दर्शकों को ढाई सौ साल पुराने इतिहास का साक्षात अहसास हो रहा था। नाटक ने अपनी सधी हुई प्रस्तुति से हॉल में मौजूद सैकड़ों दर्शकों को राष्ट्रभक्ति की भावना से सराबोर कर दिया।
नाटक में इनकी रही भूमिका।
नाटक में दादा जी की भूमिका सागर शर्मा तथा पोती की भूमिका नव्या मेहता ने निभाई। वहीं बंकिम चंद्र, जेलर और जज की भूमिका में डा. राजीव कुमार, खुदीराम बोस, महेंद्र और अंग्रेजी वकील हितेश जंगम, भवानंद और मदन लाल ढिंगड़ा चंचल शर्मा, राजलक्ष्मी और सीता की भूमिका वेदिता, सावरकर और अंग्रेज अमरदीप जांगड़ा, सुमित्रा मनू महक माल्यान, हरिराम गौरव दीपक जांगड़ा, माणिक आकाशदीप, अंग्रेज सूर्यांश चावला, लक्ष्य, सुमित, संन्यासी धु्रवम, यश ने निभाई। प्रकाश व्यवस्था पवन भारद्वाज तथा रुप सज्जा यशु भारद्वाज की रही। नाटक में संगीत संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। नाटक के अंत में सभी कलाकारों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर हरियाणा कला परिषद के कार्यालय प्रभारी धर्मपाल, न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के सदस्य नरेश सागवाल, रंगकर्मी बृज शर्मा, रजनीश गुप्ता, विनोद शर्मा, सुलेखा मखीजा, कपिल बत्रा, रचना अरोड़ा, संगीता जांगड़ा, चंद्रशेखर शर्मा आदि उपस्थित रहे।

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