
नाटक नंदू नचैया में दिखे बुंदेली लोक संस्कृति के रंग, कलाकारों ने दिखाए अभिनय कौशल।
हरियाणा कला परिषद के मंच पर जीवंत हुई बुंदेलखंड की राई विधा।
कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 19 अगस्त : हरियाणा कला परिषद तथा उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) के संयुक्त तत्वावधान में कुरुक्षेत्र के कला कीर्ति भवन में 17 से 21 अगस्त तक आयोजित पांच दिवसीय पंचजन्य नाट्य समारोह के दूसरे दिन सांस्कृतिक विरासत और रंगमंच का अनूठा संगम देखने को मिला। जिसमें बुन्देली लोक संस्कृति से कलाकारों ने कुरुक्षेत्र वासियों को भाव विभोर कर दिया। नाट्य संध्या में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. वीरेंद्र पाल मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। वहीं विशिष्ट अतिथि प्रख्यात संगीत मर्मज्ञ प्रो. शुचिस्मिता शर्मा रही। कार्यक्रम से पूर्व हरियाणा कला परिषद के कार्यालय प्रभारी धर्मपाल गुगलानी ने अतिथियों को अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया।
मंच पर दिखा लोक कलाकारों का दर्द।
राई लोक कला और कलाकारों के अंतर्द्वंद्व को समेटे नाटक नंदू नचैया में बुंदेली लोक नृत्य व नाट्य कला परिषद, सागर (मध्य प्रदेश) के रंगकर्मियों द्वारा अत्यंत प्रभावशाली मंचन किया गया। विजय सोनवाने द्वारा लिखित और संतोष रामसहाय पांडे के कुशल निर्देशन में तैयार इस नाटक का मुख्य केंद्र बिंदु बुंदेलखंड की प्रसिद्ध राई लोक कला और उसे जीने वाले कलाकारों का जीवन रहा। नाटक की कहानी मुख्य पात्र नंदू के इर्द-गिर्द बुनी गई, जो अपनी पारंपरिक राई नृत्य विधा को न केवल अपनी आजीविका मानता है, बल्कि उसे अपनी आत्मा से पूजता है। कहानी में दिखाया गया कि आधुनिक युग में पारंपरिक लोक कलाओं के प्रति समाज का नजरिया कितना बदल चुका है। एक तरफ जहां मंच पर इन कलाकारों की कला को खूब तालियां मिलती हैं, वहीं दूसरी तरफ मंच के पीछे वे भयंकर आर्थिक तंगी, सामाजिक उपेक्षा और दोहरे मापदंडों का शिकार होते हैं। गांव में ठाकुर की बहन रूपा राई कलाकार नंदू से प्रेम करने लगती है लेकिन निम्न वर्ग का होने के कारण ठाकुर नंदू को अपनाने से मना कर देता है। परिवार की उपेक्षा के बाद भी रूपा नंदू से विवाह कर लेती है। अपने परिवार और समाज के विरोध के बावजूद रुपा अपनी पवित्रता को बचाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष करती है। कुछ समय बाद ठाकुर नंदू को अपनाने का निर्णय करता है और उसे बुलाता है। लेकिन अन्य उच्च वर्ग के लोग नंदू को मार डालते हैं और राई कला को खत्म करने का प्रयास करते हैं। रुपा को जब पता चलता है कि नंदू को मार दिया गया है तो रुपा अपने बेटे को राई कलाकार बनाने का निश्चय करती है और बेटे को एक कलाकार के रुप में तैयार करती है। इस तरह राई कला के लिए नंदू अपना बलिदान देकर भी अपनी परम्परा को जिंदा रख पाता है। कलाकारों ने बुंदेली गीतों, ढोलक की पारंपरिक थापों और मखमली संवादों के जरिए लोक विधाओं के लुप्त होने के दर्द को इतनी शिद्दत से उभारा कि सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कार्यक्रम उपरांत मुख्य अतिथि मुख्य अतिथि डॉ. विरेंद्र पाल ने कलाकारों को बधाई देते हुए कहा कि रंगमंच समाज का वो जीवंत दर्पण है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़कर रखता है। हरियाणा और मध्य प्रदेश की कला का यह मिलन राष्ट्रीय एकता की अनूठी मिसाल है। वहीं विशिष्ट अतिथि प्रो. शुचिस्मिता शर्मा ने नाटक के संगीत पक्ष की विशेष सराहना करते हुए कहा कि बुंदेली लोक धुनें सीधे दिल को छूती हैं और कलाकारों के अभिनय ने इस शाम को ऐतिहासिक बना दिया है। कार्यक्रम के अंत में नाटक के निर्देशक संतोष रामसहाय पांडे और उनकी पूरी टीम को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रतिनिधि अजय गुप्ता, कपिल बत्रा, सागर शर्मा, डॉ. राजीव कुमार, सुरेखा सहित भारी संख्या में रंग प्रेमी और कुरुक्षेत्र के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कला कीर्ति भवन में नाटक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का मंचन आज।
हरियाणा कला परिषद की भरतमुनि रंगशाला में चल रहे पंचजन्य नाट्य समारोह के समापन अवसर पर आज ललित सिंह पोखरिया का लिखा और अनुराग वर्मा के निर्देशन में नाटक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली मंचित किया जाएगा। कार्यक्रम का समय शाम 6 बजे रहेगा।


