भारतीय संगीत परंपरा दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध कलाओं में से एक है : डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

राजकुमारी इंद्रा सिंह संगीत कला विश्विद्यालय, खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के दीक्षारंभ कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे।
एशिया के प्रथम संगीत विश्विद्यालय राजकुमारी इंद्रा सिंह कला संगीत विश्विद्यालय की कुलपति आचार्य डॉ. लवली शर्मा को संगीत, कला, शिक्षा, सामाजिक सहित विविध क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य के लिए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ . श्रीप्रकाश मिश्र ने मातृभूमि गौरव सम्मान से सम्मानित किया।

कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 19 अगस्त : भारतीय संस्कृति में संगीत को केवल एक कला नहीं, बल्कि एक साधना और ज्ञान का माध्यम माना गया है। प्राचीन भारत में जब शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी, तब संगीत को शिक्षा का अनिवार्य अंग माना जाता था।भारतीय संगीत केवल रचनात्मकता का माध्यम नहीं है, बल्कि यह नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी आत्मसात कराता है। यह विचार एशिया के प्रथम संगीत विश्विद्यालय राजकुमारी इंद्रा सिंह संगीत कला विश्विद्यालय, खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के दीक्षारंभ कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए। राजकुमारी इंद्रा सिंह संगीत कला विश्विद्यालय परिसर पहुंचने पर मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र का कुलपति आचार्य डॉ. लवली शर्मा, कुलसचिव डॉ. वेंकटरमण गुडे सहित समस्त संकायाध्यक्षों ने पुष्पगुच्छ देकर स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं राजकुमारी इंद्रा सिंह के चित्र के समक्ष माल्यार्पण, दीप प्रज्वलन एवं पुष्पर्चान से हुआ।
दीक्षारंभ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यातिथि मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा भारतीय संगीत परंपरा दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध कलाओं में से एक है।आज के प्रतिस्पर्धात्मक और तकनीकी युग में शिक्षा का स्वरूप अधिक व्यावसायिक और अंकों पर केंद्रित हो गया है, जिससे रचनात्मकता और भावनात्मक विकास में कमी आई है। ऐसे में भारतीय संगीत शिक्षा में संतुलन लाने का माध्यम बन सकता है।आधुनिक अनुसंधान भी यह सिद्ध कर चुके हैं कि संगीत, विशेषकर भारतीय शास्त्रीय संगीत, मस्तिष्क के तंत्रिका तंतुओं को सक्रिय करता है और स्मरणशक्ति, रचनात्मकता तथा तर्कशक्ति को बढ़ावा देता है। इसलिए, शिक्षा में संगीत का समावेश न केवल कलात्मक विकास के लिए, बल्कि बौद्धिक और भावनात्मक विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के जीवन मूल्यों को आत्मसात राष्ट्र के विकास में अपने योगदान के निर्वाह के लिए प्रेरित किया। डॉ. मिश्र ने विद्यार्थियों को आज मानव जीवन में व्याप्त अवसाद को दूर करने के लिए संगीत के माध्यम से नये नये अनुसंधान एवं शोध के लिए आह्वान किया। देश की प्रमुख पंडवानी गायिका पदम विभूषण तीजन बाई, प्रसिद्ध शहनाई उस्ताद
बिस्मिल्ला खान जैसे अनेक संगीतकारों का उदाहरण देते हुए डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने विद्यार्थियों को जीवन में आने वाली कठिन से कठिन मुश्किलो का सामना करते हुए जीवन में सफलता के शीर्ष पर को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध सितार वादक आचार्य डॉ. लवली शर्मा ने कहा राजकुमारी इंद्रा सिंह संगीत कला विश्विद्यालय, खैरागढ़ प्राचीन भारतीय संगीत की ज्ञान परंपरा को आज की युवा पीढी से जोड़ने के विगत 70 वर्ष से समर्पित है। विश्विद्यालय की उपलब्धियों को बताते हुए कुलपति ने कहा विश्वविद्यालय ने संगीत जगत की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की अनेक प्रतिभाएं दी है। संगीत शास्त्रों के अध्ययन के साथ-साथ स्वर, लय और ताल का अभ्यास विद्यार्थियों को मानसिक शांति, एकाग्रता और आत्मनियंत्रण सिखाता है। भारतीय संगीत की राग व्यवस्था और उसमें छिपे भाव केवल मन को नहीं छूते, बल्कि गहरे स्तर पर मस्तिष्क को सक्रिय करते हैं। दीक्षारंभ कार्यक्रम में कुलपति आचार्य डॉ. लवली शर्मा को संगीत,कला, शिक्षा, सामाजिक सहित विविध क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य के लिए मातृभूमि गौरव सम्मान से सम्मान पत्र एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया।
कार्यक्रम को मातृभूमि सेवा मिशन के मध्य प्रदेश के संयोजक अशोक शर्मा बतौर अतिविशिष्ट अतिथि दीक्षारंभ कार्यक्रम को संबोधित किया। दीक्षारंभ कार्यक्रम का संचालन डॉ. नमन दत्त ने किया। आभार ज्ञापन कार्यक्रम की संयोजिका एवं छात्र अधिष्ठाता डॉ. देव माइत मिंज ने किया।कार्यक्रम में प्रो. राजन यादव, हेमंत जोशी सहित विश्वविद्यालय के समस्त संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन वन्देमातरम से हुआ।

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