बच्चे की लालसा में दो बीवियों के बीच फंसा पति रहा ‘‘घर का न घाट का

हंसी के फव्वारे छोड़ गया नाटक घर का न घाट का, पति-पत्नी की नोकझोंक ने जमाया रंग।
रंगरथ नाट्य उत्सव की दूसरी शाम में नाटक मंचन से दिल्ली के कलाकारों ने गुदगुदाया।
रंगरथ नाट्य महोत्सव हरियाणा कला परिषद का एक सराहनीय प्रयास है : डा. पवन आर्य।

कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 29 मार्च : कभी-कभी व्यक्ति इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत होकर अनाप-शनाप निर्णय ले लेता है। ऐसे निर्णयों में वंशबेल बढ़ाने का निर्णय भी एक खास जगह रखता है। अक्सर लोग वंश बढ़ाने के चक्कर तथा बेटे की लालसा में बच्चे पैदा करते रहते हैं। या जिनके बेटा नहीं होता तो दूसरी शादी करने का मन बना लेते हैं। ऐसी परिस्थिति बनने पर पति हास्यपूर्ण स्थिति में फंस जाता है और न घर का रहता है ना घाट का। इसी परिस्थिति को सार्थक करता नजर आया नाटक घर का न घाट का। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर हरियाणा कला परिषद द्वारा कला कीर्ति भवन में आयोजित तीन दिवसीय रंगरथ नाट्य महोत्सव की दूसरी शाम में रंग मंडप दिल्ली के कलाकारों द्वारा हास्य नाटक मंचित किया गया। जयवर्धन के लेखन और जे.पी.सिंह के निर्देशन में लगभग डेढ़ घण्टे की अवधि वाले नाटक घर का न घाट का में कलाकारों ने दर्शकों की भरपूर वाहवाही बटौरी। इस मौके पर कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग के उपनिदेशक डॉ. पवन आर्य विशेष रूप से उपस्थित रहे। दर्शकों को संबोधित करते हुए डा. पवन आर्य ने कहा कि विश्व रंगमंच दिवस रंगकर्मियों के लिए एक पर्व के जैसा है। रंगकर्मी अपने नाटकों के माध्यम से समाज में जागरुकता लाने के साथ-साथ एक आईना दिखाने का भी प्रयास करते हैं। रंगप्रेमियों के त्योंहार को मनाने के लिए हरियाणा कला परिषद के निदेशक विवेक कालिया के दिशा-निर्देश में रंगरथ नाट्य उत्सव अत्यंत सराहनीय प्रयास है जो न केवल रंगकर्मियों को मंच प्रदान कर रहा, बल्कि लोगों को भी रंगमंच से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगा। कार्यक्रम की शुरुआत डा. पवन आर्य, धर्मपाल, बृजकिशोर शर्मा, दीपक शर्मा द्वारा दीप प्रज्वलित कर की गई। मंच का संचालन विकास शर्मा ने किया।
तीन-तीन दिन के बंटवारे में बंट गया पति, संडे को हुआ बेघर।
जयवर्धन की लेखनी से सजे हास्य नाटक की कहानी अमन, रमा और प्रिया की तकरार से शुरु होती है। अमन जो एक कला समीक्षक है तथा उसकी पहली पत्नी रमा नौकरी करती है। रमा को बच्चा न होने के कारण अमन रमा की सहमति से एक विधवा महिला प्रिया से शादी कर लेता है और वहीं से शुरू होती है रमा और प्रिया की तकरार। शादी होने के बाद रमा और प्रिया अपने पति को दूसरी पत्नी के पास भेजना पसंद नहीं करती। जिसके कारण प्रिया कोर्ट में केस कर देती है। कोर्ट का फैसला आने पर पता चलता है कि कोर्ट ने अमन को तीन-तीन दिन के लिए पत्नी के पास रहना का निर्णय लिया है। जिसमें दोनों पत्नियां तीन-तीन दिन बांट लेती है। एक दिन प्रिया अमन और रमा को बताती है कि वह मां बनने वाली है। जिसके बाद रमा और अमन दोनों प्रिया की अच्छे से देखभाल करना शुरू कर देते हैं। कुछ समय बीतने के बाद रमा भी मां बनने की खुशखबरी देती है। अमन दोनों पत्नियां से बच्चा होने की बात सुनकर झूम उठता है। लेकिन दोनों पत्नियां अपने-अपने बच्चे को पहला वारिस बताने के चक्कर में लड़ने लग जाती है। बाद में खुलासा होता है कि प्रिया ने बच्चा पैदा करने की झूठी अफवाह फैलाई थी। इस तरह दो पत्नियों के बीच फंसा पति न घर का रहता है न घाट का। हंसी के फव्वारे छोड़ते नाटक ने डेढ़ घण्टे तक दर्शकों को बांधे रखा। अपने चुटिले अंदाज में कलाकारों के अभिनय पर लोगों ने भरपूर वाहवाही की। नाटक में अमन का किरदार अरुण सोदे, रमा तृप्ति जौहरी तथा प्रिया का किरदार श्रीया कुमार ने निभाया। संगीत संचालन पवन तथा प्रकाश व्यवस्था जे.पी. सिंह ने सम्भाली। नाटक के अंत में डा. पवन आर्य ने स्मृति चिन्ह भेंट कर रंगमंडप दल का सम्मान किया। इस मौके पर शहर के कलाप्रेमी भारी मात्रा में सभागार में उपस्थित रहे।

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