भारतीय ज्ञान एवं अध्यात्म के प्रथम दिव्य पत्रकार थे महर्षि नारद मुनि : प्रो. महासिंह पूनिया

जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान में मनाई गई महर्षि नारद जयंती।

थानेसर,प्रमोद कौशिक/ संजीव कुमारी 13 मई : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान में बुधवार को देवर्षि नारद जयंती श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने महर्षि नारद के ज्ञान,अध्यात्म, संचार एवं लोककल्याण संबंधी योगदान पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि महर्षि नारद भारतीय ज्ञान परंपरा एवं अध्यात्म के प्रथम दिव्य पत्रकार थे। वे ब्रह्मा के मानस पुत्र एवं भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने तीनों लोकों में भ्रमण कर ज्ञान, भक्ति एवं सत्य का संदेश फैलाया तथा समाज को जागरूक करने का कार्य किया।
प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि महर्षि नारद केवल संदेशवाहक ही नहीं, बल्कि एक महान ऋषि, संवाददाता, गुरु एवं मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि को रामायण रचना के लिए प्रेरित किया तथा ध्रुव भक्त को भक्ति एवं साधना का मार्ग दिखाया। सामाजिक व्यवस्था एवं कानून की व्याख्या में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। ‘नारद स्मृति’ भारतीय न्याय एवं सामाजिक चिंतन का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
उन्होंने कहा कि महर्षि नारद संगीत एवं वीणा वादन के भी प्रणेता थे। वे ज्ञान, कला, संतुलन, प्रेम एवं लोक कल्याण के प्रतीक थे। उनके व्यक्तित्व में अध्यात्म, संवाद, संस्कृति और समाज सुधार का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। आज के पत्रकारों एवं संचार माध्यमों के लिए महर्षि नारद का जीवन सत्य, निष्पक्षता एवं सकारात्मक संवाद की प्रेरणा देता है।
डॉ. मधुदीप ने कहा कि महात्मा बुद्ध एवं महर्षि नारद ने भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार किया। पौराणिक साहित्य में इनसे जुड़े हुए किस्से वर्तमान पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन है।
रोमा ने कहा कि देवर्षि नारद हमें संदेश देते हैं कि पत्रकार को कटु सत्य नहीं मधुर सत्य के माध्यम से अभिव्यक्ति करनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को मीडिया साक्षरता, तथ्य-जांच और संवेदनशील संवाद के महत्व से अवगत कराया।
कार्यक्रम संयोजक डॉ. आबिद ने विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में नारद को संवाद और संचार के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, वहीं महात्मा बुद्ध ने संवाद को मानवता, विवेक और आत्मचिंतन से जोड़ा। उन्होंने कहा कि आधुनिक पत्रकारिता के मूल्यों जैसे तथ्यपरकता, जनहित, संवेदनशीलता और संवाद को भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में समझना समय की आवश्यकता है। इस अवसर पर विभाग के शिक्षक व विद्यार्थी मौजूद थे।

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