स्वस्थ शरीर, शांत मन और संतुलित जीवन की आधारशिला योग ही है:- योगाचार्य स्वामी विज्ञानानंद जी

(पंजाब)फिरोज़पुर 2 जून 2026 [कैलाश शर्मा जिला विशेष संवाददाता]=
“दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान” के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के उपलक्ष्य में स्थानीय अमर शहीद मदन लाल ढींगरा मैमोरियल पार्क में अपने स्वास्थ्य जाग्रति कार्यक्रम “आरोग्य” के अंतर्गत दो दिवसीय विशाल “विलक्षण योग शिविर” का आयोजन किया गया। जिसके आज प्रथम दिवस संस्थान की ओर से “श्री आशुतोष महाराज जी” के शिष्य योगाचार्य स्वामी विज्ञानानंद जी ने भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट विरासत “योग” की महानता से परिचित कराते हुए योग साधकों को बताया कि योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह तन, मन और आत्मा की एकात्म अवस्थ का परिचायक है, मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है, संयम और पूर्ति प्रदायक तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह मात्र व्यायाम के बारे में ही नहीं है, वरन् अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी परिवर्तनशील जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। चूंकि योग से कायिक, मानसिक व आध्यात्मिक व्याधियों का समूल उन्मूलन होता है। इसीलिए गौरवान्वित होकर यह कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण विश्व में आर्यावर्त भारतीय योग मनीषियों द्वारा प्रदत्त योग पद्धति को उत्कृष्ट निधि के रूप में सर्वसम्मति से समग्र राष्ट्रों द्वारा अग्रगण्य स्वीकार किया गया । वस्तुतः संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने दिसम्बर 2014 में प्रतिवर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस” के रूप में मनाने का संकल्प पारित किया।
योग की रहस्यात्मक विवेचना पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने बताया कि आज मूलतः कुछ योगासनों और प्राणायामों को ही सम्पूर्ण योग पद्धति स्वीकार कर लिया जाता है। जब कि ऐसा नहीं है। “योग” शब्द संस्कृत की “युज्” धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है “जुड़ना”। अर्थात् हमारे तन, मन और आत्मा की एकात्म अवस्था ही योग है। “महर्षि पातंजलि* ने “योग” की परिभाषा देते हुए कहा है कि “योगः चित्त वृत्ति निरोधः” अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। फिर ही “योगः कर्मसु कौशलम्” की अवधारणा सिद्ध होती है। अतः स्वस्थ शरीर, शांत मन और संतुलित जीवन की आधारशिला योग ही है। स्वामी जी ने पातंजलि “योग सूत्र” के अनुसार साधकों को *ताड़ासन, दण्डासन, कटिचक्रासन, अर्द्ध चंद्रासन, द्विचक्रिकासन, भुजंगासन, नाड़ीशोधन, अनुलोम विलोम प्राणायाम इत्यादि का विधिवत् अभ्यास करवाते हुए इनके वैज्ञानिक पक्ष द्वारा दैहिक लाभों से परिचित भी करवाया। सभी कैंट वासियों ने कार्यक्रम की भूरि भूरि प्रशंसा की।

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